Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 7

37 Mantra
6/7
Devata- त्वष्टा देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
उ॒पा॒वीर॒स्युप॑ दे॒वान् दैवी॒र्विशः॒ प्रागु॑रु॒शिजो॒ वह्नि॑तमान्। देव॑ त्वष्ट॒र्वसु॑ रम ह॒व्या ते॑ स्वदन्ताम्॥७॥

उ॒पा॒वीरित्यु॑पऽअ॒वीः। अ॒सि॒। उप॑। दे॒वान्। दैवीः॑। विशः॑। प्र। अ॒गुः॒। उ॒शिजः॑। वह्नि॑तमा॒निति॒ वह्नि॑ऽतमान्। देव॑। त्व॒ष्टः॒। वसु॑। र॒म॒। ह॒व्या। ते॒। स्व॒द॒न्ता॒म् ॥७॥

Mantra without Swara
उपावीरस्युप देवान्दैवीर्विशः प्रागुरुशिजो वह्नितमान् । देव त्वष्टर्वसु रम हव्या ते स्वदन्ताम् ॥

उपावीरित्युपऽअवीः। असि। उप। देवान्। दैवीः। विशः। प्र। अगुः। उशिजः। वह्नितमानिति वह्निऽतमान्। देव। त्वष्टः। वसु। रम। हव्या। ते। स्वदन्ताम॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र का प्रभु-द्रष्टा अपने आश्रम में क्या करता है ? इस विषय को प्रस्तुत मन्त्र में इस प्रकार कहते हैं कि १. ( उपावीः असि ) = तू अपने को सदा प्रभु के समीप रखता हुआ अपना अवन [ रक्षण ] करनेवाला है। वस्तुतः मनुष्य प्रभु से दूर हुआ और किसी-न-किसी वासना का शिकार बना। वासनाओं से बचने के लिए प्रभु के समीप रहना आवश्यक है। 

२. इस प्रकार के ( देवान् ) = दिव्य वृत्तिवाले ( उशिजः ) = मेधावी ( वह्नितमान् ) = औरों को भी उच्च स्थान पर प्राप्त करनेवाले लोगों के ही ( उप ) = समीप ( दैवीः विशः ) = दिव्य वृत्तिवाली प्रजाएँ ( प्रागुः ) = प्रकर्षेण प्राप्त होती हैं। जिसे औरों का निर्माण करना है, उसे पहले अपना निर्माण तो अवश्य करना ही चाहिए। स्वयं देव बने बिना वह औरों को देव न बना पाएगा। स्वयं ज्ञानी होगा तभी औरों को ज्ञान देगा। अपने को उच्च स्थान में प्राप्त कराके ही यह दूसरों को उस स्थान पर ले- चल सकता है, अतः इसका ‘देव, उशिक् व वह्नि’ बनना अत्यन्त आवश्यक है। 

३. ( देव ) = हे दिव्य गुणोंवाले! ( त्वष्टः ) = देवों का निर्माण करनेवाले [ देवशिल्पी ] अथवा औरों के दुःखों का छेदन करनेवाले ( वसु ) = [ वसु = वसूनि ] निवास के लिए आवश्यक धन में ही तू ( रम ) = आनन्द ले। अधिक धन पतन का कारण बनता है। 

४. ( हव्या ) = हव्य पदार्थ—यज्ञिय सात्त्विक भोजन ( ते ) = तुझे ( स्वदन्ताम् ) = स्वाद देनेवाले हों, रुचिकर हों। इस आहार की शुद्धि पर अन्तःकरण की शुद्धि निर्भर है। 

५. आहार को शुद्ध करके तथा धन में आसक्त न होकर तू अपनी बुद्धि को स्वस्थ रख सकेगा और बुद्धि का वर्धन करनेवाला अपने ‘मेधातिथि’ नाम को सार्थक करेगा।
Essence
भावार्थ — जो व्यक्ति औरों का भला करना चाहता है उसे स्वयं ‘देव, उशिक् [ मेधावी ] व वह्नि [ अपने को ऊँचे स्थान पर ले-जानेवाला ]’ बनना चाहिए। वह निवास के लिए आवश्यक धन से अधिक धन न चाहे और सात्त्विक भोजनों को ही करे।
Subject
देव-उशिक्-वह्नि