Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 5

37 Mantra
6/5
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- आर्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तद्विष्णोः॑ पर॒मं प॒दꣳ सदा॑ पश्यन्ति सूरयः॑। दि॒वीव॒ चक्षु॒रात॑तम्॥५॥

तत्। विष्णोः॑। प॒र॒मम्। प॒दम्। सदा॑। प॒श्य॒न्ति॒। सू॒रयः॑। दि॒वी᳕वेति॑ दिविऽइ॑व। चक्षुः॑। आत॑त॒मित्यात॑तम् ॥५॥

Mantra without Swara
तद्विष्णोः परमं पदँ सदा पश्यन्ति सूरयो दिवीव चक्षुराततम् ॥

तत्। विष्णोः। परमम्। पदम्। सदा। पश्यन्ति। सूरयः। दिवीवेति दिविऽइव। चक्षुः। आततमित्याततम्॥५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार जो अपने को प्रभु के समान न्याय्य कर्मों से जोड़ने का प्रयत्न करता है, वही वस्तुतः प्रभु का सच्चा स्तोता है। इसी प्रकार प्रभुभक्त वही है जो प्रभु के पथ पर चले। विष्णु-भजन तो विष्णु बनकर ही होता है। ये ( सूरयः ) = [ सूरिः स्तोता—नि० ३।१६ ] वेदज्ञ स्तोता ( विष्णोः ) = उस व्यापक प्रभु के ( तत् परम् पदम् ) = उस सर्वोत्कृष्ट पद को ( सदा ) = हमेशा ( पश्यन्ति ) = उसी प्रकार देखते हैं ( इव ) = जैसे ( दिवि ) = द्युलोक में ( आततं चक्षुः ) = इस फैली हुई [ व्याप्तिमत् ] सूर्यरूप आँख को सामान्य लोग देखा करते हैं। 

२. जैसे यह सूर्य सबके लिए दृश्य है, ठीक इसी प्रकार सूरि को—सच्चे स्तोता को—प्रभु भी दृश्य होते हैं। प्रभु-जैसा बनकर ये प्रभु के अत्यन्त समीप हो जाते हैं।

 
Essence
भावार्थ — हम सूरि [ वेदवित् ], ज्ञानी स्तोता बनें और प्रभु को आत्मतुल्य प्रिय हों। उस समय हम प्रभु का उतना ही स्पष्ट दर्शन कर रहे होंगे जितना कि सूर्य का।
Subject
प्रभु - दर्शन