Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 36

37 Mantra
6/36
Devata- सोमो देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- पुरोष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्रागपा॒गुद॑गध॒राक्स॒र्वत॑स्त्वा॒ दिश॒ऽआधा॑वन्तु। अम्ब॒ निष्प॑र॒ सम॒रीर्वि॑दाम्॥३६॥

प्राक्। अपा॑क्। उद॑क्। अ॒ध॒राक्। स॒र्वतः॑। त्वा॒। दिशः॑। आ। धा॒व॒न्तु॒। अम्ब॑। निः। प॒र॒। सम्। अ॒रीः। वि॒दा॒म् ॥३६॥

Mantra without Swara
प्रागपागुदगधराक्सर्वतस्त्वा दिश आ धावन्तु । अम्ब नि ष्पर समरीर्विदाम् ॥

प्राक्। अपाक्। उदक्। अधराक्। सर्वतः। त्वा। दिशः। आ। धावन्तु। अम्ब। निः। पर। सम्। अरीः। विदाम्॥३६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में निर्भयता आदि सद्गुणों के धारण का प्रसङ्ग था। उल्लिखित गुणोंवाले माता-पिता अपने सन्तानों के जीवन को सर्वतः शुद्ध बनाने का प्रयत्न करते हैं। ( प्राक् ) = पूर्व से ( अपाक् ) = पश्चिम से ( उदक् ) = उत्तर से तथा ( अधराक् ) = दक्षिण से ( सर्वतः ) = सब ओर से, सब दिशाओं से ( दिशः ) = सदा उत्तम बातों का उपदेश देनेवाले माता-पिता व आचार्यादि ( त्वा ) = तुझे ( आधावन्तु ) = सर्वतः शुद्ध बना दें। [ धावु गतिशुद्धयोः ] गति के द्वारा वे तेरे जीवन को शुद्ध करनेवाले हों। 

२. सन्तान व शिष्य माता-पिता व आचार्य से कहती है कि ( अम्ब ) = [ अमति प्रेमभावेन प्राप्नोति ] अत्यन्त प्रेम से मुझे प्राप्त होनेवाली हे मातः! ( निष्पर ) = तू नितरां मेरा पालन कर। मेरी कमियों को दूर करके उनका पूरण करनेवाली हो। ( अरीः ) = [ प्रजा वा अरीः—श० ३।९।४।२१ ] सब प्रजाएँ [ ऋ गतौ ] क्रियाशील सन्तानें— ( संविदाम् ) = [ संविदताम् ] संज्ञानवाली हों, परस्पर लड़नेवाली न हों। 

३. मधुच्छन्दा ऋषि का यह अन्तिम मन्त्र है। उसकी सर्वोत्तम इच्छा यही है कि [ क ] बड़ों के उपदेशों से हमारे जीवन शुद्ध हों। [ ख ] प्रेमभाव से प्राप्त होनेवाली माता अपने उपदेशों से बच्चे के जीवन को बड़ा उत्तम बनाये। [ ग ] सब प्रजाएँ परस्पर मिलकर चलनेवाली—संज्ञानवाली हों।
Essence
भावार्थ — माता-पिता अपने सन्तानों का, आचार्य शिष्यों का तथा राजा प्रजा का सर्वतः शोधन करे, उन्हें बुराइयों से दूर करे, जिससे सब सन्तान परस्पर संज्ञानवाली हों।
Subject
सर्वतो-धावन [ शोधन ]