Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 29

37 Mantra
6/29
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यम॑ग्ने पृ॒त्सु मर्त्य॒मवा॒ वाजे॑षु॒ यं जु॒नाः। स यन्ता॒ शश्व॑ती॒रिषः॒ स्वाहा॑॥२९॥

यम्। अ॒ग्ने॒। पृत्स्विति॑ पृ॒त्ऽसु। मर्त्य॑म्। अवाः॑। वाजे॑षु। यम्। जु॒नाः। सः। यन्ता॑। शश्व॑तीः। इषः॑। स्वाहा॑ ॥२९॥

Mantra without Swara
यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यञ्जुनाः । स यन्ता शश्वतीरिषः स्वाहा ॥

यम्। अग्ने। पृत्स्विति पृत्ऽसु। मर्त्यम्। अवाः। वाजेषु। यम्। जुनाः। सः। यन्ता। शश्वतीः। इषः। स्वाहा॥२९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र की समाप्ति ‘समोषधीभिरोषधीः’ पर हुई थी कि ओषधियाँ ओषधियों से सङ्गत हों, अर्थात् ओषधियों की कमी न हो जाए। उसी प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि राजा का कर्त्तव्य है कि संग्रामों के समय भी वैश्यवर्ग को पीड़ित न होने दे और ऐसी व्यवस्था करे कि उस समय भी ये अपने कृषि आदि कार्यों में लगे रह सकें। यदि युद्धों के आधिक्य के कारण वैश्य युवकों का भी सेना में प्रवेश वाच्छनीय हुआ तब कृषि आदि कार्य कैसे हो सकेंगे, अतः कहते हैं कि ( अग्ने ) = राष्ट्र का नेतृत्व करनेवाले राजन्! आप ( यं मर्त्यम् ) = जिस मनुष्य को ( पृत्सु ) = संग्रामों में ( अवाः ) = सुरक्षित रखते हो और ( यम् ) = जिसे ( वाजेषु ) = [ अन्ननिमित्त-क्षेत्रादिषु—द० ] अन्न आदि पदार्थों की सिद्धि करने के निमित्त [ क्षेत्रादि ] में ( जुनाः ) = [ गमयेः—द० ] नियुक्त करते हो ( सः ) = वह ( शश्वतीः ) = नष्ट न होनेवाले ( इषः ) = अन्नों को ( यन्ता ) = प्राप्त करता है, इसप्रकार उस राजा के राष्ट्र में अन्नों की कमी नहीं आती। ( स्वाहा ) = यह बात [ सु+आह ] वेद में उत्तमता से कही गई है।
Essence
भावार्थ — राजा ऐसी व्यवस्था करे कि युद्ध के समय भी खेती आदि कार्य निर्बाधरूप से चलते रहें।
Subject
युद्ध के समय भी वैश्यवर्ग की कृषि आदि में व्यापृतता
Footnote
सूचना — अध्यात्म प्रकरण में अर्थ यह होगा—हे ( अग्ने ) = उन्नति साधक प्रभो! ( पृत्सु ) = काम- क्रोधादि से संग्रामों में ( यं मर्त्यम् ) = जिस मनुष्य की ( अवाः ) = आप रक्षा करते हो और ( यम् ) =  जिसको ( जुनाः ) = प्रेरणा प्राप्त कराते हो ( सः ) = वह ( शश्वतीः ) = क्रियामय अथवा सनातन ( इषः ) = प्रेरणाओं को ( यन्ता ) = प्राप्त होता है, अर्थात् हृदयस्थ आपकी प्रेरणाओं को सुनता है।