Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 28

37 Mantra
6/28
Devata- प्रजा देवताः Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
कार्षि॑रसि समु॒द्रस्य॒ त्वा क्षि॑त्या॒ऽउन्न॑यामि। समापो॑ऽअ॒द्भिर॑ग्मत॒ समोष॑धीभि॒रोष॑धीः॥२८॥

कार्षिः॑। अ॒सि॒। स॒मु॒द्रस्य॑। त्वा। अक्षि॑त्यै। उत्। न॒या॒मि॒। सम्। आपः॑। अ॒द्भिरित्य॒त्ऽभिः। अ॒ग्म॒त॒। सम्। ओष॑धीभिः। ओष॑धीः ॥२८॥

Mantra without Swara
कार्षिरसि समुद्रस्य त्वाक्षित्या उन्नयामि । समापो अद्भिरग्मत समोषधीभिरोषधीः ॥

कार्षिः। असि। समुद्रस्य। त्वा। अक्षित्यै। उत्। नयामि। सम्। आपः। अद्भिरित्यत्ऽभिः। अग्मत। सम्। ओषधीभिः। ओषधीः॥२८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
राष्ट्र की उन्नति के प्रसङ्ग में वैश्यवर्ण का उल्लेख करते हैं। वस्तुतः गत मन्त्र में वर्णित ‘कर’ इन्हें ही देना है। १. ( कार्षिः असि ) = तू कृषि करानेवाला है। राष्ट्र में ‘कृषिगोरक्ष- वाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्’ = कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। वैश्यों ने शूद्रों = अपठित व्यक्तियों के द्वारा इन कृषि आदि कर्मों को कराना है। 

२. सर्वोत्तम कृषि उस मेघ-जल द्वारा होती है जो मेघ ‘यज्ञात् भवति पर्जन्यः’ = यज्ञ से निर्मित होता है। राष्ट्र में यज्ञों की व्यवस्था ठीक होने पर बादल ठीक समय पर वर्षा करनेवाले होते हैं [ निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु ]। इन यज्ञों की व्यवस्था राजा को ही करनी है। यज्ञ न करनेवाले को राजा ने चोर के रूप में दण्ड देना है, अतः मन्त्र में कहते हैं कि ( समुद्रस्य ) = अन्तरिक्षस्थ मेघ की ( क्षित्या ) = खेती से ( त्वा ) = तुझे ( उन्नयामि ) = उन्नत करता हूँ। भाषा में ऐसा ही बोलने का प्रकार है कि ‘यह कूएँ की खेती खड़ी है’ अर्थात् कूएँ के जल से उत्पन्न। इसी प्रकार यहाँ कहा है कि ‘समुद्र की खेती से’ अर्थात् [ समुद्रः = अन्तरिक्षस्थ मेघ ] मेघजल से उत्पन्न खेती से। ३. ( आपः ) = जल ( अद्भिः ) = जलों से ( सम् ) = सङ्गत हों और ( ओषधीः ) = ओषधियाँ ( ओषधीभिः ) = ओषधियों से ( सम् ) =  सङ्गत हों, अर्थात् अवृष्टि के कारण जलों का विच्छेद न हो जाए और परिणामतः ओषधियों की उत्पत्ति में रुकावट न हो।
Essence
भावार्थ — राष्ट्र में वैश्यवर्ण कृषि के कार्य में किसी प्रकार का शैथिल्य न आने दें। यज्ञों के परिणामरूप वृष्टि समय-समय पर होती रहे, जिससे ओषधियों व अन्नों की उत्पत्ति में कमी न आ जाए।
Subject
वैश्यवर्ण व कृषि