Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 27

37 Mantra
6/27
Devata- आपो देवताः Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
देवी॑रापोऽअपां नपा॒द्यो व॑ऽऊ॒र्मिर्ह॑वि॒ष्यऽइन्द्रि॒यावा॑न् म॒दिन्त॑मः। तं दे॒वेभ्यो॑ देव॒त्रा द॑त्त शुक्र॒पेभ्यो॒ येषां॑ भा॒ग स्थ॒ स्वाहा॑॥२७॥

देवीः॑। आ॒पः। अ॒पा॒म्। नपा॒त्। यः। वः॒। ऊ॒र्म्मिः। ह॒वि॒ष्यः॒। इ॒न्द्रि॒यावा॑न्। इ॒न्द्रि॒यवा॒निती॑न्द्रिय॒ऽवा॑न्। म॒दिन्त॑म॒ इति॑ म॒दिन्ऽत॑मः। तम्। दे॒वेभ्यः॑। दे॒व॒त्रेति॑ देव॒ऽत्रा। द॒त्त॒। शु॒क्र॒पेभ्य इति॑ शुक्र॒ऽपेभ्यः॑। येषा॑म्। भा॒गः। स्थ। स्वाहा॑ ॥२७॥

Mantra without Swara
देवीरापो अपान्नपाद्यो व ऊर्मिर्विष्य इन्द्रियावान्मदिन्तमः । तन्देवेभ्यो देवत्रा दत्त शुक्रपेभ्यो येषाम्भाग स्थ स्वाहा ॥

देवीः। आपः। अपाम्। नपात्। यः। वः। ऊर्म्मिः। हविष्यः। इन्द्रियावान्। इन्द्रियवानितीन्द्रियऽवान्। मदिन्तम इति मदिन्ऽतमः। तम्। देवेभ्यः। देवत्रेति देवऽत्रा। दत्त। शुक्रपेभ्य इति शुक्रऽपेभ्यः। येषाम्। भागः। स्थ। स्वाहा॥२७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में राजा का उल्लेख था। प्रस्तुत मन्त्र में राजदेय कर का उल्लेख करते हैं। १. हे ( देवीः ) = दिव्य गुणोंवाली ( आपः ) = प्रजाओ! ( यो वः ) = जो तुम्हारा ( हविष्यः ) = [ हविर्भ्यो हितः, हु = दान ] कररूप में देने के लिए रक्खा हुआ भाग है ( तम् ) = उसे ( देवेभ्यः ) = दिव्य गुणोंवाले—विलासशून्य जीवनोंवाले ( शुक्रपेभ्यः ) = वीर्य का पान [ रक्षण ] करनेवाले जितेन्द्रिय राजाओं के लिए ( देवत्रा ) = दिव्य गुणों की प्राप्ति के निमित्त ( दत्त ) = दे डालो, उन राजाओं को दे डालो ( येषाम् ) = जिनके तुम ( भाग स्थ ) = [ भाजः ] सेवा के योग्य हो, सेवनीय हो। ( स्वाहा ) =  जो राजा तुम्हारी सेवा के लिए अपनी आहुति दे डालता है, अपने स्वार्थों को छोड़कर, अपने आराम को त्यागकर, जो तुम्हारी उन्नति में ही दिन-रात लगा रहता है। तुम सोये हो, तब भी वह ‘जागृवि’ है।

इस मन्त्रभाग में यह बात स्पष्ट है कि [ क ] राजा को दिव्य गुणोंवाला, सब विलासों से ऊपर [ देव ] जितेन्द्रिय [ शुक्रप ] तथा प्रजा-सेवक [ भाग ] होना चाहिए। प्रजा की सेवा के लिए वह अपने सभी स्वार्थों को छोड़ दे। [ ख ] प्रजाओं को भी दिव्य व आप्त [ विश्वास के योग्य ] बनने का प्रयत्न करना। [ ग ] प्रजा राजा को कर दे, क्योंकि इस कर-प्राप्त धन से ही राष्ट्र की सब सुव्यवस्था सम्भव होगी और प्रजाओं में शिक्षा के द्वारा ही अधिकाधिक उत्तम गुणों को उपजाया जा सकेगा।

२. यह ‘कर’ ( अपान्नपात् ) = प्रजाओं का न पतन होने देनेवाला है। इस प्रकार कर को ठीक प्रकार से देनेवाली प्रजाओं में विलास की वृत्तियाँ उत्पन्न नहीं होतीं, क्योंकि उनके पास उन विलासों के लिए अतिरिक्त धन रह ही नहीं जाता। 

३. ( ऊर्मिः ) = यह ‘कर’ लहर के समान है। लहर समुद्र में उठती है फिर समुद्र में ही जा गिरती है। इसी प्रकार यह कर प्रजा से उठता है और फिर उसी प्रजा में जा गिरता है। प्रजा से प्राप्त करके प्रजाहित के लिए इस धन का व्यय कर दिया जाता है। इस ‘कर’ से राजा को अपने ही अन्तःपुरों [ महलों ] की रचना नहीं करनी चाहिए। 

४. ( इन्द्रियावान् ) = इस कर ने प्रजाओं को [ इन्द्रियं वै वीर्यम् ] शक्तिशाली बनाना है अथवा प्रशस्त इन्द्रियोंवाला बनाना है। 

५. ( मदिन्तमः ) = यह कर प्रजाओं को आनन्द देनेवाला है। इस ‘कर’ के द्वारा सुन्दर वनों, उपवनों, तालाबों और नहरों आदि का निर्माण होकर प्रजा का जीवन सच्चा हर्ष व आनन्द प्राप्त करता है। प्रजाओं के लिए उत्तमोत्तम आमोद-प्रमोद के साधनों को यह ‘कर’ प्राप्त कराता है।
Essence
भावार्थ — कर का उद्देश्य है कि [ क ] ऐसी व्यवस्था की जाए कि प्रजाओं का पतन न हो। [ ख ] वह प्रजाहित के लिए ही विनियुक्त हो। [ ग ] प्रजाओं को प्रशस्तेन्द्रिय व शक्तिशाली बनाये। [ घ ] प्रजाओं के लिए उत्तम आमोद-प्रमोद के साधनों को भी जुटाये।
Subject
कर [ tax ]