Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 26

37 Mantra
6/26
Devata- सोमो देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् गायत्री,आर्षी गायत्री, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सोम॑ राज॒न् विश्वा॒स्त्वं प्र॒जाऽउ॒पाव॑रोह॒ विश्वा॒स्त्वां प्र॒जाऽउ॒पाव॑रोहन्तु। शृ॒णोत्व॒ग्निः स॒मिधा॒ हवं॑ मे शृ॒ण्वन्त्वापो॑ धि॒षणा॑श्च दे॒वीः। श्रोता॑ ग्रावाणो वि॒दुषो॒ न य॒ज्ञꣳ शृ॒णोतु॑ दे॒वः स॑वि॒ता हवं॑ मे॒ स्वाहा॑॥२६॥

सोम॑। रा॒ज॒न्। विश्वाः॑। त्वम्। प्रजा॒ इति॑ प्र॒ऽजाः। उ॒पाव॑रो॒हेत्यु॑प॒ऽअव॑रोह। विश्वाः॑। त्वाम्। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। उपाव॑रोह॒न्त्वित्यु॑प॒ऽअव॑रोहन्तु। शृ॒णोतु॑। अ॒ग्निः। स॒मिधेति॑ स॒म्ऽइधा॑। हव॑म्। मे॒। शृ॒ण्वन्तु॑। आपः॑। धि॒षणाः॑। च॒। दे॒वीः। श्रोत॑। ग्रा॒वा॒णः॒। वि॒दुषः॑। न। य॒ज्ञम्। शृ॒णोतु॑। दे॒वः। स॒वि॒ता। हव॑म्। मे॒। स्वाहा॑ ॥२६॥

Mantra without Swara
सोम राजन्विश्वास्त्वम्प्रजा उपाव रोह विश्वास्त्वाम्प्रजाऽउपाव रोहन्तु । शृणोत्वग्निः समिधा हवम्मे शृण्वन्त्वापो धिषणाश्च देवीः श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञँ शृणोतु देवः सविता हवम्मे स्वाहा ॥

सोम। राजन्। विश्वाः। त्वम्। प्रजा इति प्रऽजाः। उपावरोहेत्युपऽअवरोह। विश्वाः। त्वाम्। प्रजा इति प्रऽजाः। उपावरोहन्त्वित्युपऽअवरोहन्तु। शृणोतु। अग्निः। समिधेति सम्ऽइधा। हवम्। मे। शृण्वन्तु। आपः। धिषणाः। च। देवीः। श्रोत। ग्रावाणः। विदुषः। न। यज्ञम्। शृणोतु। देवः। सविता। हवम्। मे। स्वाहा॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रजाओं को उत्तम बनाने में सबसे अधिक भाग राजा का है, अतः ‘राजा कैसा हो’ इस विषय का वर्णन प्रस्तुत मन्त्र में करते हैं कि १. हे ( सोम राजन् ) = सौम्य निरभिमानिन् राजन्! ( त्वम् ) = तू ( विश्वाः प्रजाः ) = सब प्रजाओं के ( उप अवरोह ) = समीप प्राप्त हो और ( विश्वाः प्रजाः ) =  सब प्रजाएँ ( त्वाम् उप अवरोहन्तु ) = तेरे समीप प्राप्त हों। राजा प्रजाओं के लिए अधृष्य ही न बन जाए, वह उनके लिए अभिगम्य भी हो। जो राजा प्रजाओं के लिए अभिगम्य न होगा, वह प्रजाओं की स्थिति को कभी ठीक-ठीक न समझ सकेगा। 

२. राजा प्रार्थना करता है कि राष्ट्र में ( अग्निः ) = ज्ञान का प्रकाश देनेवाला ‘ब्राह्मण’ ( समिधा ) = ज्ञान-दीप्ति के हेतु से ( मे हवम् ) =  मेरी पुकार को ( शृणोतु ) = सुने, अर्थात् जब-जब मैं इन ब्राह्मणों को आमन्त्रित करूँ तब-तब ये अवश्य मुझे दर्शन देने की कृपा करें और मुझे आवश्यक ज्ञान देकर मेरे अज्ञानान्धकार को दूर करें। 

४. ( आपः ) = राष्ट्र के आप्त पुरुष तथा प्रजाएँ ( धिषणाः च ) = जो बुद्धि के ही मूर्त्तरूप हैं तथा ( देवीः ) = दिव्य गुणोंवाले हैं, वे भी ( शृण्वन्तु ) = मेरे आमन्त्रण को स्वीकार करें। इन व्यक्तियों को जब कभी मैं मन्त्रणा आदि के लिए कहूँ तो वे इसे अस्वीकार न करें। 

५. ( ग्रावाणः श्रोत ) = हे सद्-असद् का विवेक करनेवाले सभासदो! [ विद्वांसो हि ग्रावाणः—श० ३।९।३।१४ ] तुम भी मेरी बात को सुनो। ( न ) = जैसे ( विदुषः ) = विद्वान् से ( यज्ञम् ) = यज्ञ को सुनते हैं इसी प्रकार मैं तुमसे राष्ट्रहित के लिए आवश्यक बातों को सुननेवाला होऊँ। 

६. सबसे बड़ी बात तो यह है कि ( सविता देवः ) = वह सबका प्रेरक देव प्रभु ( ‘मे हवम्’ ) = मेरी प्रार्थना को ( शृणोतु ) = सुने। मैं भी ( स्वाहा ) = उस प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाला बनूँ।
Essence
भावार्थ — राजा को निरभिमानी होना चाहिए। वह प्रजाओं के लिए अभिगम्य हो। ब्राह्मण उसे ज्ञान दें। आप्त बुद्धिमान् सत्पुरुष उसे राष्ट्रकार्य में सहायता करें। विवेकी पुरुषों से वह उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त करे जैसेकि वह विद्वानों से यज्ञ के विषय में सुनता है। प्रभु का यह उपासक हो।
Subject
राजा