Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 23

37 Mantra
6/23
Devata- अब्यज्ञसूर्या देवताः Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ह॒विष्म॑तीरि॒माऽआपो॑ ह॒विष्माँ॒२ऽआवि॑वासति। ह॒विष्मा॑न् दे॒वोऽअ॑ध्व॒रो ह॒विष्माँ॑२ऽअस्तु॒ सूर्यः॑॥२३॥

ह॒विष्म॑तीः। इ॒माः। आपः॑। ह॒विष्मा॑न्। आ। वि॒वा॒स॒ति॒। ह॒विष्मा॑न्। दे॒वः। अ॒ध्व॒रः। ह॒विष्मा॑न्। अ॒स्तु॒। सूर्यः॑ ॥२३॥

Mantra without Swara
हविष्मतीरिमा आपो हविष्माँ आ विवासति । हविष्मान्देवो अध्वरो हविष्माँ अस्तु सूर्यः ॥

हविष्मतीः। इमाः। आपः। हविष्मान्। आ। विवासति। हविष्मान्। देवः। अध्वरः। हविष्मान्। अस्तु। सूर्यः॥२३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में वर्णन था कि सब प्रजाएँ जलों, ओषधियों व गौवों की रक्षा करनेवाली हों। अब कहते हैं कि ( इमाः ) = ये जल, ओषधि व गौवों की हिंसा न करनेवाली ( आपः ) = प्रजाएँ ( हविष्मतीः ) = हविवाली हों। ये सदा दानपूर्वक अदन करनेवाली हों। वस्तुतः ( हविष्मान् ) = यह दानपूर्वक अदन करनेवाला व्यक्ति ही ( आविवासति ) = प्रभु की परिचर्या करता है। प्रभु का आदेश है ( त्यक्तेन भुञ्जीथाः ) = त्यागपूर्वक भोग करो। बस, जो इस आदेश का पालन करता है, वही प्रभु का सच्चा उपासक है। 

२. ‘केवलाघो भवति केवलादी’ अकेला खानेवाला शुद्ध पाप ही खाता है। ‘अपञ्चयज्ञो मलिम्लुचः’ पञ्च यज्ञ न करनेवाला चोर है और वस्तुतः इसके विपरीत ( हविष्मान् ) = दानपूर्वक अदन करनेवाला ( देवः ) = दिव्य गुणोंवाला बनता है। इसके मन में दान की वृत्ति होती है। ( अध्वरः ) = इसके हाथों से सदा ‘अ-हिंसात्मक’ उत्तम कर्म होते हैं। २१ वें मन्त्र में यही बात ‘दिव्यं नभः’ शब्दों से कही गई थी—‘प्रकाशमय अहिंसा’। 

३. और इन दोनों बातों से बढ़कर बात यह है कि ( हविष्मान् ) = यह हविवाला—दानपूर्वक अदन करनेवाला ( सूर्यः ) = ज्ञान का सूर्य ( अस्तु ) = हो। दूसरे शब्दों में हविष्मान् पुरुष का मन ‘देवों’ वाला होता है, उनके हाथों में ‘अध्वर’ होते हैं और इनका मस्तिष्करूप द्युलोक ज्ञान के सूर्य से देदीप्यमान हो उठता है। 

४. एवं, ‘दिर्घतमाः’ का यही मार्ग है कि वह ‘हविष्मान्’ बने।
Essence
भावार्थ — हे प्रभो! आपकी कृपा से हविष्मान् बनकर हम आपके सच्चे उपासक बनें और अपने मनों को दिव्य गुणों का कोश बनाएँ। हविष्मान् के हाथों में अध्वर होता है और मस्तिष्क में ज्ञान का सूर्य।
Subject
हविष्मान्