Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 21

37 Mantra
6/21
Devata- सेनापतिर्देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- याजुषी उष्णिक्,स्वराट् उत्कृति, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स॒मु॒द्रं ग॑च्छ॒ स्वाहा॒न्तरि॑क्षं गच्छ॒ स्वाहा॑ दे॒वꣳ स॑वि॒तारं॑ गच्छ॒ स्वाहा॑ मि॒त्रावरु॑णौ गच्छ॒ स्वाहा॑होरा॒त्रे ग॑च्छ॒ स्वाहा॒ छन्दा॑सि गच्छ॒ स्वाहा॒ द्या॑वापृथि॒वी ग॑च्छ॒ स्वाहा॒ य॒ज्ञं ग॑च्छ॒ स्वाहा॒ सोमं॑ गच्छ॒ स्वाहा॑ दि॒व्यं नभो॑ गच्छ॒ स्वाहा॒ग्निं वै॑श्वान॒रं ग॑च्छ॒ स्वाहा॒ मनो॑ मे॒ हार्दि॑ यच्छ॒ दिवं॑ ते धू॒मो ग॑च्छतु॒ स्वर्ज्योतिः॑ पृथि॒वीं भस्म॒नापृ॑ण॒ स्वाहा॑॥२१॥

स॒मु॒द्रम्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। अ॒न्तरिक्ष॑म्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। दे॒वम्। स॒वि॒तार॑म्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। मि॒त्रावरु॑णौ। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। अ॒हो॒रा॒त्रेऽइत्य॑होरा॒त्रे। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। छन्दा॑ꣳसि। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावापृथि॒वी। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। य॒ज्ञम्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। सोम॑म्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। दि॒व्यम्। नभः॑। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। अ॒ग्निम्। वै॒श्वा॒न॒रम्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। मनः॑। मे॒। हार्दि॑। य॒च्छ॒। दिव॑म्। ते॒। धू॒मः। ग॒च्छ॒तु॒। स्वः॑। ज्योतिः॑। पृ॒थि॒वीम्। भस्म॑ना। आ। पृ॒ण॒। स्वाहा॑ ॥२१॥

Mantra without Swara
समुद्रङ्गच्छ स्वाहान्तरिक्षङ्गच्छ स्वाहा देवँ सवितारङ्गच्छ स्वाहा मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहा अहोरात्रे गच्छ स्वाहा छन्दाँसि गच्छ स्वाहा द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा यज्ञङ्गच्छ स्वाहा सोमङ्गच्छ स्वाहा दिव्यन्नभो गच्छ स्वाहा अग्निँवैश्वानरङ्गच्छ स्वाहा मनो मे हार्दि यच्छ । दिवन्ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्यातिः पृथिवीम्भस्मनापृण स्वाहा ॥

समुद्रम्। गच्छ। स्वाहा। अन्तरिक्षम्। गच्छ। स्वाहा। देवम्। सवितारम। गच्छ। स्वाहा। मित्रावरुणौ। गच्छ। स्वाहा। अहोरात्रेऽइत्यहोरात्रे। गच्छ। स्वाहा। छन्दाꣳसि। गच्छ। स्वाहा। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। गच्छ। स्वाहा। यज्ञम्। गच्छ। स्वाहा। सोमम्। गच्छ। स्वाहा। दिव्यम्। नभः। गच्छ। स्वाहा। अग्निम्। वैश्वानरम्। गच्छ। स्वाहा। मनः। मे। हार्दि। यच्छ। दिवम्। ते। धूमः। गच्छतु। स्वः। ज्योतिः। पृथिवीम्। भस्मना। आ। पृण। स्वाहा॥२१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में ‘देवत्रा यन्तम्’ दिव्य गुणों की ओर जानेवाले का उल्लेख था। वे दिव्य गुण ही प्रस्तुत मन्त्र में प्रतिपादित हो रहे हैं। १. ( स्वाहा ) [ स्वाहा = वाक्—नि० १।११ ] वेदवाणी के द्वारा ( समुद्रं गच्छ ) = समुद्र को जा। समुद्र गम्भीरता का प्रतीक है। वेदवाणी व ज्ञान की वाणियों के पढ़ने का जीवन पर पहला परिणाम यह है कि मनुष्य की मनोवृत्ति गम्भीरता को लिये हुए होती है। वह उथला नहीं होता। इस गम्भीरता का अभिप्राय किसी प्रकार भी उदास व मुस्कराहट से शून्य चेहरे से नहीं है। यह व्यक्ति स-मुद्रः = सदा प्रसन्न होता है। मनःप्रसाद इसकी दृष्टि में सर्वोच्च तप है। 

२. ( स्वाहा ) = इस वेदवाणी के द्वारा ( अन्तरिक्षं गच्छ ) = अन्तरिक्षं को प्राप्त हो। ‘अन्तरिक्ष’ मध्यमार्ग का प्रतीक है। अन्तरा क्षि = बीच में चलना। अन्तरिक्ष भी द्युलोक और पृथिवीलोक के बीच में है। अति में न जाकर सदा मध्य में रहना। अतिभोजन न करना, उपवास में भी अति न कर जाना। 

३. ( देवं सवितारं गच्छ स्वाहा ) = तू वाणी के द्वारा जीवन को प्रकाश देनेवाले सूर्य को प्राप्त हो। सूर्य को प्राप्त होने का अभिप्राय ‘तेजसा सूर्यसंकाशः’ इन शब्दों में स्पष्ट है—तू सूर्यदेव के समान तेजस्वी बन। ज्ञान भोगों से हटाता है तो तेजस्वी भी बनाता है। 

४. ( मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहा ) = वेदवाणी के द्वारा तू मित्रावरुण को प्राप्त करनेवाला हो। ‘मित्र’ स्नेह की देवता है तो ‘वरुण’ द्वेष-निवारण की देवता है। ज्ञानी बनकर सब ‘प्रभु के ही पुत्र हैं’ ऐसा समझनेवाला द्वेष कर ही नहीं सकता। वह सबसे प्रेम करेगा ही। 

५. ( अहोरात्रे गच्छ स्वाहा ) = इन ज्ञान की वाणियों से तू अहन् व रात्रि को प्राप्त हो। अहन् ‘दिन’ है—यह न हनन करने योग्य है। ज्ञानी पुरुष दिन के एक क्षण को भी अकर्मण्यता में नहीं बिताता। इसी का परिणाम है कि रात्रि इसके लिए रमयित्री होती है। इसमें कार्यों का विराम करके वह वस्तुतः निद्रा में रमण करनेवाला होता है—सुख की नींद सोता है। 

६. ( स्वाहा ) = इन ज्ञान की वाणियों के द्वारा तू ( छन्दांसि गच्छ ) = [ छन्दांसि छादनात् ] छन्दों को प्राप्त हो—तेरे पापों का छादन हो। ये ज्ञान की वाणियाँ तुझे पापों के आक्रमण से बचानेवाली हों। 

७. ( स्वाहा ) = इस वेदवाणी के द्वारा तू ( द्यावापृथिवी गच्छ ) = द्यावापृथिवी को प्राप्त कर। तेरा मस्तिष्करूप द्युलोक द्युतिमय हो। तेरा पृथिवीरूप शरीर प्रथन = विस्तारवाला हो। 

८. ( यज्ञं गच्छ स्वाहा ) = तू इस वेदवाणी से यज्ञ को प्राप्त हो। तेरा जीवन यज्ञिय हो। ज्ञान को प्राप्त करके ‘मनुष्य स्वार्थी बना रहे’ यह नहीं हो सकता। 

९. ( स्वाहा ) = इस ज्ञान की वाणी के अध्ययन से तू ( सोमं गच्छ ) = सोम को प्राप्त हो। शरीर में वीर्य की रक्षा करनेवाला बन। 

१०. इस सोमरक्षा से जहाँ तू ( स्वाहा ) = वेदवाणी का अध्ययन करता हुआ ( दिव्यं नभः ) = प्रकाशमय द्युलोक को ( गच्छ ) = प्राप्त हो, वहाँ ११. ( स्वाहा ) = इस ज्ञान की वाणी के द्वारा ( वैश्वानरं अग्निम् ) = वैश्वानर अग्नि को, अर्थात् पाचनशक्ति को ( गच्छ ) = प्राप्त हो। यह ज्ञान तुझे अतिभोजन व असंयमादि दोषों से बचाकर सदा दीप्त अग्निवाला बनाएगा। जब तक तेरी अग्नि दीप्त है तब तक तेरा शरीर सर्वथा स्वस्थ ही रहेगा। 

१२. इस स्वस्थ शरीर में, प्रभु दीर्घतमा से कहते हैं कि ( मे ) = मेरे दिये हुए ( मनः ) = इस मन को ( हार्दि ) = हृदय [ heart ] में ( यच्छ ) = तू नियन्त्रित करनेवाला बन। मन ‘हृत् प्रतिष्ठ’ है। यह जब कभी स्थिर होगा तो हृदय में ही स्थिर होगा, क्योंकि वहाँ प्रभु का निवास है और इस प्रभु में एक बार उलझा हुआ मन न उसके ओर-छोर को पा सकता है और न फिर वहाँ से निकल सकता है। मन का स्वभाव ही यह है कि किसी भी वस्तु को चारों ओर से देखकर फिर उससे ऊब जाता है और अन्यत्र भागने की करता है। प्रभु को न तो यह पूरी तरह से देख पाता है और न ही फिर वहाँ से निकल पाता है। एवं, यह हृदय में नियन्त्रित हो जाता है। 

१३. नियन्त्रित मनवाला व्यक्ति ही यज्ञादि उत्तम कर्मों में लग पाता है। प्रभु इससे कहते हैं कि ( ते ) = तेरा ( धूमः ) = यज्ञ का धूम ( दिवं गच्छतु ) = द्युलोक तक पहुँचे, ( ज्योतिः ) = यह यज्ञाङ्गिन की ज्योति तेरे ( स्वः ) = स्वर्ग का कारण बने। यज्ञों से सब रोगादि दूर होकर घर स्वर्ग बन जाता है, अतः तू ( पृथिवीम् ) = इस पृथिवी को ( भस्मना ) = यज्ञाङ्गिन की भस्म से ( पृण ) = पूरित कर दे। इस पृथिवी पर स्थान-स्थान पर यज्ञ होंगे तो सब ऋतुएँ ठीक समय पर आकर सबके कल्याण का कारण बनेंगी।
Essence
भावार्थ — हम जीवन में गाम्भीर्य, मध्यमार्गाक्रमण, तेजस्विता, स्नेह व द्वेषाभाव, कर्मठता व सुखनिद्रा, पाप-निवारण, देदीप्यमान मस्तिष्क व दृढ़ शरीर, यज्ञ, सोमरक्षा, प्रकाशमय अहिंसक वृत्ति तथा तीव्र जाठराङ्गिन को धारण करें। मन को वशीभूत करके यज्ञमय जीवन बिताएँ।
Subject
ग्यारह दिव्य गुण