Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 20

37 Mantra
6/20
Devata- त्वष्टा देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऐ॒न्द्रः प्रा॒णोऽअङ्गे॑ऽअङ्गे॒ निदी॑ध्यदै॒न्द्रऽउ॑दा॒नोऽअङ्गे॑ऽअङ्गे॒ निधी॑तः। देव॑ त्वष्ट॒र्भूरि॑ ते॒ सꣳस॑मेतु॒ सल॑क्ष्मा॒ यद्विषु॑रूपं॒ भवा॑ति। दे॒व॒त्रा यन्त॒म॑वसे॒ सखा॒योऽनु॑ त्वा मा॒ता पि॒तरो॑ मदन्तु॥२०॥

ऐ॒न्द्रः। प्रा॒णः। अङ्गे॑ऽअङ्ग॒ इत्यङ्गे॑ऽअङ्गे। नि। दी॒ध्य॒त्। ऐ॒न्द्रः। उ॒दा॒न इत्यु॑त्ऽआ॒नः। अङ्गे॑ऽअङ्ग॒ इत्यङ्गे॑ऽअङ्गे। निधी॑त॒ इति॒ निऽधीतः। देव॑। त्व॒ष्ट॒। भूरि॑। ते॒। सꣳस॒मिति॒ सम्ऽस॑म्। ए॒तु॒। सल॒क्ष्मेति॒ सऽल॑क्ष्म। यत्। विषु॑रूप॒मिति॒ वि॒षु॑ऽरूपम्। भवा॑ति। दे॒व॒त्रेति॑ देव॒ऽत्रा। यन्त॑म्। अव॑से। सखा॑यः। अनु॑। त्वा॒। मा॒ता॒। पि॒तरः॑। म॒द॒न्तु॒ ॥२०॥

Mantra without Swara
ऐन्द्रः प्राणोऽअङ्गेअङ्गे निदीध्यदैन्द्रऽउदानोऽअङ्गेअङ्गे निधीतः । देव त्वष्टर्भूरि ते सँसमेतु सलक्ष्मा यद्विषुरूपम्भवाति । देवत्रा यन्तमवसे सखायोनु त्वा माता पितरो मदन्तु ॥

ऐन्द्रः। प्राणः। अङ्गेऽअङ्ग इत्यङ्गेऽअङ्गे। नि। दीध्यत्। ऐन्द्रः। उदान इत्युत्ऽआनः। अङ्गेऽअङ्ग इत्यङ्गेऽअङ्गे। निधीत इति निऽधीतः। देव। त्वष्ट। भूरि। ते। सꣳसमिति सम्ऽसम्। एतु। सलक्ष्मेति सऽलक्ष्म। यत्। विषुरूपमिति विषुऽरूपम्। भवाति। देवत्रेति देवऽत्रा। यन्तम्। अवसे। सखायः। अनु। त्वा। माता। पितरः। मदन्तु॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र के अनुसार सब शत्रुओं का संहार कर देने से १. ( ऐन्द्रः प्राणः ) = जीव की प्राणशक्ति ( अङ्गे अङ्गे ) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग में ( निदीध्यत् ) = चमकती है। ( ऐन्द्रः उदानः ) = यह जीव-सम्बन्धी उदानशक्ति भी ( अङ्गे अङ्गे ) = प्रत्येक अङ्ग में ( निधीतः ) = [ निहितः ] निहित हुई है। प्राणशक्ति स्वास्थ्य का कारण बनती है तो उदानशक्ति ज्ञानवृद्धि के द्वारा सब प्रकार के उत्थान का कारण होती है। 

२. हे ( देव ) = दिव्य गुणसम्पन्न! ( त्वष्टः ) = शक्ति व ज्ञान के द्वारा सब उत्तमताओं का निर्माण करनेवाले! ( ते ) = तुझे ( भूरि ) = [ भृ = धारणपोषण ] धारणपोषण के सब तत्त्व ( सम् सम् एतु ) = उत्तमता से प्राप्त हों। ( यत् ) = जो ( विषुरूपम् ) = प्रतिकूलता हो वह ( सलक्ष्मा ) =  अनुकूलता में परिणत ( भवाति ) = हो जाती है। प्राणोदान शक्ति के ठीक होने पर किसी तत्त्व की प्रतिकूलता का प्रश्न ही नहीं रह जाता। ये प्राणोदान सबको अनुकूल कर लेते हैं। 

३. सबको अनुकूल बनाकर ( अवसे ) = अपने रक्षण के लिए ( देवत्रा यन्तम् ) = दिव्य गुणों की ओर जाते हुए ( त्वा अनु ) = तुझे देखकर ( सखायः ) = सब सखा व ( माता पितरः ) = माता-पिता ( मदन्तु ) = हर्ष का अनुभव करें। तुम्हें उन्नतिपथ पर जाते देखकर सबको प्रसन्नता हो।
Essence
भावार्थ — प्राण एवं उदान को सिद्ध करके हम जीवन का निर्माण करें। दिव्य गुणों की ओर बढ़ें। हमारे जीवन को देखकर मित्रों व पिता-माता को प्रसन्नता हो।
Subject
प्रतिकूल की अनुकूलता