Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 16

37 Mantra
6/16
Devata- द्यावापृथिव्यौ देवते Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्,ब्राह्मी उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
रक्ष॑सां भागोऽसि॒ निर॑स्त॒ꣳ रक्ष॑ऽइ॒दम॒हꣳ रक्षो॒ऽभिति॑ष्ठामी॒दम॒हꣳ रक्षोऽव॑बाधऽइ॒दम॒हꣳ रक्षो॑ऽध॒मं तमो॑ नयामि। घृ॒तेन॑ द्यावापृथिवी॒ प्रोर्णु॑वाथां॒ वायो॒ वे स्तो॒काना॑म॒ग्निराज्य॑स्य वेतु॒ स्वाहा॒ स्वाहा॑कृतेऽऊ॒र्ध्वन॑भसं मारु॒तं ग॑च्छतम्॥१६॥

रक्षसा॒म्। भा॑गः॒। अ॒सि॒। निर॑स्त॒मिति॒ निःऽअ॑स्तम्। रक्षः॑ इ॒दम्। अ॒हम्। रक्षः॑। अ॒भि। ति॒ष्ठा॒मि॒। इ॒दम्। अ॒हम्। रक्षः॑। अव॑बा॒धे॒। इ॒दम्। अ॒हम्। रक्षः॑। अ॒ध॒मम्। तमः॑। न॒या॒मि॒। घृ॒तेन॑। द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑ द्यावापृथिवी। प्र। ऊ॒र्णु॒वा॒था॒म्। वायो॒ऽइति॒ वायो॑। वेः। स्तो॒काना॑म्। अ॒ग्निः। आज्य॑स्य। वे॒तु॒। स्वाहा॑। स्वाहा॑कृत॒ऽइति॒ स्वाहा॑ऽकृते। ऊ॒र्ध्वन॑भस॒मित्यू॒र्ध्वन॑भसम्। मा॒रु॒तम्। ग॒च्छ॒त॒म् ॥१६॥

Mantra without Swara
रक्षसाम्भागो सि निरस्तँ रक्षः इदमहँ रक्षो भि तिष्ठामीदमहँ रक्षो व बाधऽइदमहँ रक्षो धमन्तमो नयामि । घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथाँ वायो वे स्तोकानामग्निराज्यस्य वेतु स्वाहा स्वाहाकृते ऊर्ध्वनभसम्मारुतङ्गच्छतम् ॥

रक्षसाम्। भागः। असि। निरस्तमिति निःऽअस्तम्। रक्षः इदम्। अहम्। रक्षः। अभि। तिष्ठामि। इदम्। अहम्। रक्षः। अवबाधे। इदम्। अहम्। रक्षः। अधमम्। तमः। नयामि। घृतेन। द्यावापृथिवी इति द्यावापृथिवी। प्र। ऊर्णुवाथाम्। वायोऽइति वायो। वेः। स्तोकानाम्। अग्निः। आज्यस्य। वेतु। स्वाहा। स्वाहाकृतऽइति स्वाहाऽकृते। ऊर्ध्वनभसमित्यूर्ध्वनभसम्। मारुतम्। गच्छतम्॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. अपने सब अङ्ग-प्रत्यङ्गों का आप्यायन करके हे मेधातिथि! तू ( रक्षसाम् ) = राक्षसी वृत्तियों का ( भागः ) = दूर भगानेवाला [ भज् = put to flight ] ( असि ) = है। ( रक्षः ) = सब रोगकृमि ( निरस्तम् ) = दूर फेंक दिये गये हैं। ( इदम् ) = यह ( अहम् ) = मैं ( रक्षः ) = इन राक्षसी वृत्तियों का ( अभितिष्ठामि ) =  मुक़ाबला करता हूँ। ( इदम् अहम् ) = यह मैं ( रक्षः ) = इन रोगकृमियों को ( अधमं तमः नयामि ) = सबसे निकृष्ट अन्धकारमय स्थान में पहुँचाता हूँ, अपने से दूर अदृश्य स्थान में धकेल देता हूँ। 

२. इस प्रकार राक्षसी वृत्तियों व रोगकृमियों को दूर करके ( द्यावापृथिवी ) = [ द्यौरहं पृथिवी त्वम् ] पति-पत्नी दोनों ही ( घृतेन ) = मलक्षरण द्वारा शरीर के स्वास्थ्य से और ज्ञान की दीप्ति से ( प्रोर्णुवाथाम् ) = अपने को आच्छादित करते हैं। 

३. हे ( वायो ) = गति के द्वारा अपनी सब बुराइयों को समाप्त करनेवाले! तू ( स्तोकानाम् ) = छोटी-छोटी बातों का भी ( वेः ) = जाननेवाला हो [ वेः = विद्धि—द० ]। यदि हम छोटी-छोटी ग़लतियों को अपने अन्दर न आने देंगे, तभी वास्तविक उत्थान होगा। 

४. ( अग्निः ) = यह प्रकाशमय जीवनवाला व्यक्ति ( आज्यस्य ) = [ आज्यं वै तेजः ] तेज को ( वेतु ) = प्राप्त करें। 

५. ( स्वाहा ) = इन सब बातों के लिए वह स्वार्थत्याग करे। 

६. और हे ( स्वाहाकृते ) = स्वार्थत्याग करनेवाले पति-पित्नयो ! ( ऊर्ध्वनभसम् ) = उत्कृष्ट हिंसावाले ( मारुतम् ) =  रश्मि-समूह को ( गच्छतम् ) = प्राप्त होवो। ज्ञान की रश्मियों का समूह वासनाओं का विनाश करता है। यह वासना-विनाश ही उत्कृष्ट हिंसा है। [ नभ् हिंसायाम् ]।
Essence
भावार्थ — हम रोगकृमियों व राक्षसी वृत्तियों को अपने से दूर कर दें। पति-पत्नी दोनों ही स्वस्थ व ज्ञानी बनें। छोटी-छोटी कमियों का ध्यान करके उन्हें दूर करें। स्वार्थत्याग करनेवाले ये पति-पत्नी उस ज्ञान रश्मिसमूह को प्राप्त करें जो उनकी वासनाओं के अन्धकार का विनाश करे।
Subject
रक्षो बाधन