Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 15

37 Mantra
6/15
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- स्वराट् धृति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मन॑स्त॒ऽआप्या॑यतां॒ वाक् त॒ऽआप्या॑यतां प्रा॒णस्त॒ऽआप्या॑यतां॒ चक्षु॑स्त॒ऽआप्या॑यता॒ श्रोत्रं॑ त॒ऽआप्या॑यताम्। यत्ते॑ क्रू॒रं यदास्थि॑तं॒ तत्त॒ऽआप्या॑यतां॒ निष्ट्या॑यतां॒ तत्ते॑ शुध्यतु॒ शमहो॑भ्यः। ओष॑धे॒ त्राय॑स्व॒ स्वधि॑ते॒ मैन॑ꣳ हिꣳसीः॥१५॥

मनः॑। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। वाक्। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। प्रा॒णः। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। चक्षुः॑। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। श्रोत्र॑म्। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। यत्। ते॒। क्रू॒रम्। यत्। आस्थि॑त॒मित्याऽस्थि॑तम्। तत्। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। निः। स्त्या॒य॒ता॒म्। तत्। ते॒। शु॒ध्य॒तु। शम्। अहो॑भ्य॒ इत्यहः॑ऽभ्यः। ओष॑धे। त्राय॑स्व। स्वधि॑त॒ इति॒ स्वऽधि॑ते। मा। ए॒न॒म्। हि॒ꣳसीः॒ ॥१५॥

Mantra without Swara
मनस्तऽआप्यायताँवाक्त आप्यायताम्प्राणस्त आप्यायताञ्चक्षुस्त आप्यायताँश्रोत्रन्त आ प्यायताम् । यत्ते क्रूरँ यदास्थितन्तत्त आप्यायतान्निष्प्यायतान्तत्ते शुध्यतु शमहोभ्यः । ओषधे त्रायस्व स्वधिते मैनँ हिँसीः ॥

मनः। ते। आ। प्यायताम्। वाक्। ते। आ। प्यायताम्। प्राणः। ते। आ। प्यायताम्। चक्षुः। ते। आ। प्यायताम्। श्रोत्रम्। ते। आ। प्यायताम्। यत्। ते। क्रूरम्। यत्। आस्थितमित्याऽस्थितम्। तत्। ते। आ। प्यायताम्। निः। स्त्यायताम्। तत्। ते। शुध्यतु। शम्। अहोभ्य इत्यहःऽभ्यः। ओषधे। त्रायस्व। स्वधित इति स्वऽधिते। मा। एनम्। हिꣳसीः॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र के ‘शोधन’ के बाद प्रस्तुत मन्त्र में ‘आप्यायन’ का वर्णन आता है। आचार्य विद्यार्थी से कहता है कि १. ( ते मनः आप्यायताम् ) = तेरा मन बढ़े। तेरे मन में सदा उत्साह का सञ्चार हो। निराशा तेरे मनःप्रसाद में किसी प्रकार की कमी को न आने दे। 

२. ( ते वाक् आप्यायताम् ) = तेरी वाणी आप्यायित हो—यह सदा सत्य बोलने के कारण ‘क्रियाफलाश्रित’ हो, अर्थात् जैसा तेरी वाणी से निकले वैसा ही हो जाए। 

३. ( ते प्राणः आप्यायताम् ) = तेरे प्राण आप्यायित हों। तेरी घ्राणेन्द्रिय की शक्ति बढ़े। तू सूँघने के द्वारा ही ‘सगन्धत्व’ को, बन्धुत्व को, पहचाननेवाला हो। 

४. ( ते चक्षुः आप्यायताम् ) = तेरी दृष्टिशक्ति आप्यायित हो। तू दूर तक देख सके, सूक्ष्म वस्तु को भी तेरी आँख देखने में समर्थ हो। 

५. ( श्रोत्रं ते आप्यायताम् ) = तेरी श्रवणशक्ति विकसित हो। तू सूक्ष्म शब्दों को भी सुनने में समर्थ हो। 

६. ( यत् ते क्रूरम् ) = जो कुछ भी तेरा भयंकर कर्म व स्वभाव है ( तत् ते ) = वह तेरा ( निष्ट्यायताम् ) = तुझसे दूर हो जाए, ( तत् ते शुध्यतु ) = वह तेरा शुद्ध हो जाए। तेरे उस स्वभाव का शोधन होकर क्रूरता दूर हो जाए। ( यत् ) = जो ( आस्थितम् ) = तेरी स्थिरता व दृढ़ता है, वह ( आप्यायताम् ) = आप्यायित हो, अर्थात् तुझमें क्रूरता तो न हो, परन्तु मोहमयी मृदुता भी न हो, तेरे स्वभाव में कुछ दृढ़ता बनी रहे। 

७. इस क्रूरता के न होने और स्थिरता के होने से ( अहोभ्यः शम् ) = तेरे दिनों के लिए शान्ति हो, अर्थात् तू शान्तिपूर्वक दिनों को बितानेवाला बन। 

८. ( ओषधे ) = हे दोषों का दहन करनेवाले आचार्य ! ( त्रायस्व ) = तू विद्यार्थी की रक्षा कर, उसे किन्हीं भी असदाचरणों में गिरने से बचा। 

९. ( स्वधिते ) = आत्मीयों का धारण करनेवाले तथा आत्मतत्त्व का धारण करनेवाले! तू ( एनम् ) = इस अपने शिष्य को ( मा हिंसीः ) = मत हिंसित होने दे।
Essence
भावार्थ — आचार्य-कृपा से विद्यार्थी के सब अङ्गों का आप्यायन हो। उसका स्वभाव उत्तम हो। वह वासनाओं का शिकार न हो जाए।
Subject
आप्यायन