Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 1

37 Mantra
6/1
Devata- सविता देवता Rishi- आगस्त्य ऋषिः Chhand- निचृत् पङ्क्ति,आसुरी उष्णिक्,भूरिक् आर्षी उष्णिक्, Swara- धैवतः, ऋषभः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आद॑दे॒ नार्य॑सी॒दम॒हꣳ रक्ष॑सां ग्रीवाऽअपि॑कृन्तामि। यवो॑ऽसि य॒वया॒स्मद् द्वेषो॑ य॒वयारा॑तीर्दि॒वे त्वा॒ऽन्तरि॑क्षाय त्वा पृथि॒व्यै त्वा॒ शुन्ध॑न्ताँल्लो॒काः पि॑तृ॒षद॑नाः पितृ॒षद॑नमसि॥१॥

दे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वे। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुऽभ्याम्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम्। आ। द॒दे॒। नारि॑। अ॒सि॒। इदम्। अ॒हम्। रक्ष॑साम्। ग्री॒वाः। अपि॑। कृ॒न्ता॒मि॒। यवः॑। अ॒सि॒। य॒वय॑। अ॒स्मत्। द्वेषः॑। य॒वय॑। अरा॑तीः। दि॒वे। त्वा॒। अ॒न्तरि॑क्षाय। त्वा॒। पृ॒थि॒व्यै। त्वा॒। शुन्ध॑न्ताम्। लो॒काः। पि॒तृ॒षद॑नाः। पि॒तृ॒सद॑ना॒ इति॑ पितृ॒ऽसद॑नाः। पि॒तृ॒षद॑नम्। पि॒तृ॒ष॑दन॒मिति॑ पि॒तृ॒ऽसद॑नम्। अ॒सि॒ ॥१॥

Mantra without Swara
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । आददे नार्यसीदमहँ रक्षसाङ्ग्रीवाऽअपि कृन्तामि । यवोसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीर्दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा शुन्धन्ताँलोकाः पितृषदनाः पितृषदनमसि ॥

देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रऽसवे। अश्विनोः। बाहुभ्यामिति बाहुऽभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्। आ। ददे। नारि। असि। इदम्। अहम्। रक्षसाम्। ग्रीवाः। अपि। कृन्तामि। यवः। असि। यवय। अस्मत्। द्वेषः। यवय। अरातीः। दिवे। त्वा। अन्तरिक्षाय। त्वा। पृथिव्यै। त्वा। शुन्धन्ताम्। लोकाः। पितृषदनाः। पितृसदना इति पितृऽसदनाः। पितृषदनम्। पितृषदनमिति पितृऽसदनम्। असि॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत अध्याय की समाप्ति ‘अगस्त्य ऋषि’ के ‘सहस्रवल्शः विरोहण’ [ Mani- fold evolution ] के साथ हुई थी। इस अध्याय का प्रारम्भ उस विरोहण के रहस्य के प्रतिपादन से होता है। अगस्त्य इस सर्वतोमुखी विकास को इसलिए कर पाये कि उन्होंने संसार की प्रत्येक वस्तु का प्रयोग बड़ा ठीक किया। इस प्रयोग में इनके तीन नियम रहे— [ क ] हे पदार्थ! ( त्वा ) = तुझे ( सवितुः देवस्य प्रसवे ) = उत्पादक व प्रेरक देव की प्रेरणा के अनुसार, अर्थात् ऋतरूप में—न अधिक न कम— ( आददे ) = ग्रहण करता हूँ। [ ख ] ( अश्विनोः बाहुभ्याम् ) = प्राणापान के प्रयत्न से ग्रहण करता हूँ—बिना मूल्य के नहीं लेता। [ ग ] ( पूष्णः हस्ताभ्याम् ) = पूषा के हाथों से ग्रहण करता हूँ, अर्थात् केवल पोषण के दृष्टिकोण से ग्रहण करता हूँ, इसीलिए हे पदार्थ! तू ( नारिः ) = मुझ नर का हित करनेवाला ( असि ) = है। 

२. इस प्रकार प्रत्येक वस्तु का ठीक प्रयोग करता हुआ मैं सहस्रवल्शः विरोहण वा अनेकविध विकासवाला बनता हूँ और ( इदम् अहम् ) = यह मैं ( रक्षसाम् ) = राक्षसों की ग्रीवा को ( अपिकृन्तामि ) =  काट देता हूँ। सब रोगों व बुरी वृत्तियों को विच्छिन्न कर देता हूँ। 

३. हे प्रभो! ( यवः असि ) =  आप सब बुराइयों को हमसे दूर करनेवाले हैं। ( अस्मत् ) = हमसे ( द्वेषः ) = द्वेष को ( यवय ) =  पृथक् कीजिए। हे प्रभो! हम ( त्वा ) = आपके समीप आते हैं ( दिवे ) = मस्तिष्करूप द्युलोक के विकास के लिए ( त्वा ) = आपके समीप आते हैं ( अन्तरिक्षाय ) = हृदयान्तरिक्ष के नैर्मल्य के लिए ( त्वा ) = हम आपके पास आते हैं, ( पृथिव्यै ) = शरीररूप पृथिवी के विस्तार के लिए। 

४. आपकी कृपा से ( लोकाः ) = हमारे लोक [ मस्तिष्क = द्यौः, मन = अन्तरिक्ष, शरीर = पृथिवी ] ( शुन्धन्ताम् ) = शुद्ध हों। ( पितृषदनाः ) = हमारे घर ज्ञानियों के सदन बनें, उनमें ज्ञानी पुरुषों का आना-जाना बना रहे। ( पितृषदनम् असि ) = हे प्रभो! आप ज्ञानियों में ही निवास करनेवाले हैं। मैं भी ज्ञानियों के सम्पर्क में आकर ज्ञानी बनूँ और अपने को आपका निवासस्थान बना पाऊँ।
Essence
भावार्थ — हम प्रत्येक पदार्थ का प्रयोग ठीक करें जिससे नीरोग व निर्मल बनें। द्वेष व अदान से ऊपर उठें। त्रिविध उन्नति करके, ज्ञानियों के सम्पर्क में ज्ञानी बनकर प्रभु का निवासस्थान बनें।
Subject
पितृ — सदन