Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 42

43 Mantra
5/42
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आगस्त्य ऋषिः Chhand- भूरिक् अत्यष्टि, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अत्य॒न्याँ२ऽअगां॒ नान्याँ२ऽउपा॑गाम॒र्वाक् त्वा॒ परे॒भ्योऽवि॑दं प॒रोऽव॑रेभ्यः। तं त्वा॑ जुषामहे देव वनस्पते देवय॒ज्यायै॑ दे॒वास्त्वा॑ देवय॒ज्यायै॑ जुषन्तां॒ विष्ण॑वे त्वा। ओष॑धे॒ त्राय॑स्व॒ स्वधि॑ते॒ मैन॑ꣳ हिꣳसीः॥४२॥

अति॑। अ॒न्यान्। अगा॑म्। उप॑। अ॒गा॒म्। अ॒र्वाक्। त्वा॒। परे॑भ्यः। अवि॑दम्। प॒रः॒। अव॑रेभ्यः। तम्। त्वा॒। जु॒षा॒म॒हे॒। दे॒व॒। व॒न॒स्प॒ते॒। दे॒व॒य॒ज्याया॒ इति॑ देवऽय॒ज्यायै॑। दे॒वाः। त्वा॒। दे॒व॒य॒ज्याया इति देवऽय॒ज्यायै॑। जु॒ष॒न्ता॒म्। विष्ण॑वे। त्वा॒। ओष॑धे। त्रा॑यस्व। स्वधि॑ते। मा। ए॒न॒म्। हि॒ꣳसीः॒ ॥४२॥

Mantra without Swara
अत्यन्याँ अगान्नान्याँ उपागामर्वाक्त्वा परेभ्योविदम्परो वरेभ्यः । तन्त्वा जुषामहे देव वनस्पतेदेवयज्यायै देवास्त्वा देवयज्यायै जुषन्ताँ विष्णवे त्वा । ओषधे त्रायस्व स्वधिते मैनँ हिँसीः ॥

अति। अन्यान्। अगाम्। उप। अगाम्। अर्वाक्। त्वा। परेभ्यः। अविदम्। परः। अवरेभ्यः। तम्। त्वा। जुषामहे। देव। वनस्पते। देवयज्याया इति देवऽयज्यायै। देवाः। त्वा। देवयज्याया इति देवऽयज्यायै। जुषन्ताम्। विष्णवे। त्वा। ओषधे। त्रायस्व। स्वधिते। मा। एनम्। हिꣳसीः॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में तीन व्रतों का संकेत है। उन व्रतों का पालन ही ‘तीन पदों का विक्रमण’ हैं। इन तीन कदमों का रखनेवाला मैं ( अन्यान् अति अगाम् ) = औरों को लाँघ जाता हूँ। अव्रती पुरुष को व्रती सदा लाँघ जाता है। इसका जीवन उत्कृष्ट होता है। मैं ( अन्यान् ) = [ अविदुषो विरुद्धान्—द० ] व्रत-पराङ्मुख मूर्खजनों को ( न उपागाम् ) = न प्राप्त होऊँ। ( परेभ्यः ) = [ उत्तमेभ्यः ] श्रेष्ठ पुरुषों से ( त्वा ) = तुझे ( अर्वाक् ) = अन्दर ही ( अविदम् ) = मैंने जाना है। श्रेष्ठ पुरुषों से मुझे यह ज्ञान हुआ है कि आपका दर्शन तो अन्दर ही होना है। ( अवरेभ्यः ) = इन अवर आचार्यों से भी मैंने यही जाना है कि आप ( परः ) = पर हैं [ बुद्धेरात्मा महान् परः—गीता ] आप वाणी व मन का विषय नहीं हैं—आप वाङ्मनसातीत हैं। अथवा ( त्वा ) = आपको मैंने ( अवरेभ्यः अर्वाक् ) = समीपों से भी समीप और ( परेभ्यः परः ) [ इति ] = दूर से भी दूर ( अविदम् ) = जाना है। 

२. ( ते त्वा ) = उस आपको हे ( देव ) = दिव्य गुणों के पुञ्ज! ( वनस्पते ) = भक्तों के रक्षक प्रभो! ( जुषामहे ) = हम प्रीतिपूर्वक सेवन करते हैं। हम प्रेम से आपकी उपासना करते हैं। ( देवयज्यायै ) = [ देवानां सङ्गतये—द० ] दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए हम उपासना करते हैं। ( देवाः ) = सब विद्वान् लोग ( देवयज्यायै ) = दिव्य गुणों की सङ्गति के लिए ही ( त्वा जुषन्ताम् ) = तेरी उपासना करें। 

३. ( विष्णवे त्वा ) = हे प्रभो! मैं आपको इसलिए उपासित करता हूँ कि आपकी उपासना से मेरा शरीर स्वस्थ होता है, मन निर्मल तथा बुद्धि दीप्त होती है। इन्हीं तीन कदमों को रखकर ही मैं ‘त्रिविक्रम विष्णु’ बनता हूँ। 

३. ( ओषधे ) = हे दोषों का दहन करनेवाले प्रभो! ( त्रायस्व ) = आप मेरा त्राण कीजिए। ( स्वधिते ) = [ स्व =  आत्मीय ] हे अपनों का धारण करनेवाले प्रभो! ( एनम् ) = इस अपने भक्त को  (मा  ) = मत ( हिंसीः ) = हिंसित होने दीजिए।
Essence
भावार्थ — प्रभु हमारे अन्दर ही हैं। उनकी उपासना से [ क ] दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है। [ ख ] व्यापक उन्नति हो पाती है। [ ग ] आसुर आक्रमणों से हमारी रक्षा होती है और [ घ ] हम प्रभु के आत्मीय बन जाते हैं।
Subject
आगे बढ़ जाना