Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 41

43 Mantra
5/41
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- आगस्त्य ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उ॒रु वि॑ष्णो॒ विक्र॑मस्वो॒रु क्षया॑य नस्कृधि। घृ॒तं घृ॑तयोने पिब॒ प्रप्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहा॑॥४१॥

उ॒रु। वि॒ष्णो॒ऽइति॑ विष्णो। वि। क्र॒म॒स्व॒। उ॒रु। क्षया॑य। नः॒। कृ॒धि॒। घृ॒तम्। घृ॒त॒यो॒न॒ इति॑ घृतऽयोने। पि॒ब॒। प्रप्रेति॒ प्रऽप्र॑। य॒ज्ञप॑ति॒मिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिम्। ति॒र॒। स्वाहा॑ ॥४१॥

Mantra without Swara
उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि । घृतङ्घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिन्तिर स्वाहा ॥

उरु। विष्णोऽइति विष्णो। वि। क्रमस्व। उरु। क्षयाय। नः। कृधि। घृतम्। घृतयोन इति घृतऽयोने। पिब। प्रप्रेति प्रऽप्र। यज्ञपतिमिति यज्ञऽपतिम्। तिर। स्वाहा॥४१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में ‘मैं व्रतपा बन सकूँ’ इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु कहते हैं कि १. हे ( विष्णो ) = व्यापक उन्नति करनेवाले जीव! ( उरु विक्रमस्व ) = खूब पुरुषार्थ कर। ( नः क्षयाय ) = हमारे निवास के लिए ( उरु कृधि ) = अपने हृदयान्तरिक्ष को विशाल बना। तेरे विशाल हृदय में ही पवित्रता के कारण मेरा निवास होगा। 

२. हे ( घृतयोने ) = क्षरण या दीप्तिरूप योनिवाले जीव! ( घृतं पिब ) = तू घृत का पान कर। तेरे शरीर का स्वास्थ्य मलों के ठीक क्षरण पर निर्भर करता है और तेरे मस्तिष्क के विकास के लिए ज्ञान की दीप्ति का महत्त्व है। 

३. इस प्रकार [ क ] तू हृदय को विशाल बनाता है, [ ख ] शरीर को निर्मल व स्वस्थ और [ ग ] मस्तिष्क को ज्ञान से दीप्त। यह त्रिविध उन्नति करके तू तीन कदमों का रखनेवाला ‘त्रिविक्रम’ बनता है। 

४. त्रिविक्रम बनकर तू ( यज्ञपतिम् ) = सब यज्ञों के रक्षक उस प्रभु को ( प्रप्रतिर ) = अपने में खूब बढ़ा। ( स्वाहा ) = इस यज्ञपति को अपने में बढ़ाने के लिए तुझे ‘स्व’ का हा = त्याग करना है। वस्तुतः स्वार्थ की आहुति दे डालना ही यज्ञपति का वर्धन करना है।
Essence
भावार्थ — हम हृदयों को विशाल बनाएँ। शरीर को निर्मल, नीरोग तथा मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त। इस प्रकार विष्णु बनकर, व्यापक उन्नति करके उस विष्णु के सच्चे उपासक बनें। ये तीन ही हमारे मुख्य व्रत हैं।
Subject
‘त्रिविक्रम बनना’ = तीन मुख्य व्रतों का धारण करना