Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 4

43 Mantra
5/4
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्नाव॒ग्निश्च॑रति॒ प्रवि॑ष्ट॒ऽऋषी॑णां पु॒त्रोऽअ॑भिशस्ति॒पावा॑। स नः॑ स्यो॒नः सु॒यजा॑ यजे॒ह दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यꣳ सद॒मप्र॑युच्छ॒न्त्स्वाहा॑॥४॥

अ॒ग्नौ। अ॒ग्निः। च॒र॒ति॒। प्रविष्ट॑ इति॒ प्रऽवि॒ष्टः। ऋषी॑णाम्। पु॒त्रः। अ॒भि॒श॒स्ति॒पावेत्य॑भिशस्ति॒ऽपावा॑। सः। नः॒। स्यो॒नः। सु॒यजेति॑ सु॒ऽयजा॑। य॒ज॒। इ॒ह। दे॒वेभ्यः॑। ह॒व्यम्। सद॑म्। अप्र॑युच्छ॒न्नित्यप्र॑ऽयुच्छन्। स्वाहा॑ ॥४॥

Mantra without Swara
अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋषीणाम्पुत्रोऽअभिशस्तिपावा । स नः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्यँ सदमप्रयुच्छन्त्स्वाहा ॥

अग्नौ। अग्निः। चरति। प्रविष्ट इति प्रऽविष्टः। ऋषीणाम्। पुत्रः। अभिशस्तिपावेत्यभिशस्तिऽपावा। सः। नः। स्योनः। सुयजेति सुऽयजा। यज। इह। देवेभ्यः। हव्यम्। सदम्। अप्रयुच्छन्नित्यप्रऽयुच्छन्। स्वाहा॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में ‘नः भवतम्’ शब्दों में ‘प्रभु का बनने’ का उल्लेख था। यह प्रभु का बननेवाला व्यक्ति १. ( अग्नौ प्रविष्टः ) = उस अग्रेणी प्रकाशमय प्रभु में प्रविष्ट हुआ-हुआ ( अग्निः ) = स्वयं भी अग्नि-सा बना हुआ ( चरति ) = अपनी क्रियाओं को करता है। प्रभु ‘अग्नि’ हैं। यह भक्त भी प्रभु में प्रविष्ठ होकर अग्नि ही बन जाता है। अग्नि बनकर यह अपने कर्त्तव्य कर्मों को करता चलता है। 

२. यह तो अब ( ऋषीणां पुत्रः ) = [ ऋषिर्वेदः ] वेदों का पुत्र होता है। वेदमन्त्रों में दिये गये ज्ञान से अपने को पवित्र करता है [ पुनाति ] और रोगों व वासनाओं के आक्रमण से अपने को बचाता है [ त्रायते ]। 

३. ( अभिशस्तिपावा ) = यह सब प्रकार की हिंसाओं से अपने को सुरक्षित रखता है। अहिंसा ही यम-नियमों में सर्वप्रथम है, सब यम-नियमों का यह केन्द्र है। 

४. प्रभु कहते हैं कि ( सः नः ) = वह तू हमारा बना हुआ, प्रकृति के भोगों में न फँसकर प्रभुप्रवण बना हुआ ( स्योनः ) = सबको सुख देनेवाला ( सुयजाः ) = उत्तम यज्ञोंवाला ( इह ) = इस जीवन में ( यज ) = यज्ञशील बन। तुझमें ‘देवपूजा, सङ्गतीकरण व दान’ की वृत्ति हो। 

५. ( देवेभ्यः ) = देवों के लिए ( सदम् ) = सदा ( अप्रयुच्छन् ) = किसी प्रकार का प्रमाद न करता हुआ ( हव्यं स्वाहा ) = सुहुत हवि को देनेवाला हो। गीता के शब्दों में ‘तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः’ — देवताओं से प्राप्त इन सब भोग्य पदार्थों को देवों के लिए न देकर स्वयं ही खा जानेवाला चोर है, अतः नैत्यिक अग्निहोत्र के द्वारा ‘देवयज्ञ’ करके ही खाना उचित है।
Essence
भावार्थ — प्रभुभक्त अग्निरूप प्रभु में प्रवेश करके अग्नि-सा ही बन जाता है—‘शुद्ध’। अब इसकी सब क्रियाएँ पवित्र यज्ञात्मक होती हैं।
Subject
अग्नि - प्रवेश