Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 39

43 Mantra
5/39
Devata- सोमसवितारौ देवते Rishi- आगस्त्य ऋषिः Chhand- साम्नी बृहती,निचृत् आर्षी पङ्क्ति, Swara- मध्यमः, पञ्चमः
Mantra with Swara
देव॑ सवितरे॒ष ते॒ सोम॒स्तꣳ र॑क्षस्व॒ मा त्वा॑ दभन्। ए॒तत्त्वं दे॑व सोम दे॒वो दे॒वाँ२ऽउपागा॑ऽइ॒दम॒हं म॑नु॒ष्यान्त्स॒ह रा॒यस्पोषे॑ण॒ स्वाहा॒ निर्वरु॑णस्य॒ पाशा॑न्मुच्ये॥३९॥

देव॑। स॒वि॒तः॒। ए॒षः। ते॒। सोमः॑। तम्। र॒क्ष॒स्व॒। मा। त्वा॒। द॒भ॒न्। ए॒तत्। त्वम्। दे॒व॒। सो॒म॒। दे॒वः। दे॒वान्। उप॑। अ॒गाः॒। इ॒दम्। अ॒हम्। म॒नु॒ष्या॒न्। स॒ह। रा॒यः। पोषे॑ण। स्वाहा॑। निः। वरु॑णस्य। पाशा॑त्। मु॒च्ये॒ ॥३९॥

Mantra without Swara
देव सवितरेष ते सोमस्तँ रक्षस्व मा त्वा दभन् । एतत्त्वन्देव सोम देवो देवाँऽउपागा इदमहम्मनुष्यान्त्सह रायस्पोषेण स्वाहा निर्वरुणस्य पाशान्मुच्ये ॥

देव। सवितः। एषः। ते। सोमः। तम्। रक्षस्व। मा। त्वा। दभन्। एतत्। त्वम्। देव। सोम। देवः। देवान्। उप। अगाः। इदम्। अहम्। मनुष्यान्। सह। रायः। पोषेण। स्वाहा। निः। वरुणस्य। पाशात्। मुच्ये॥३९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में दिये गये प्रभु के आदेश को सुनकर अगस्त्य प्रार्थना करता है कि हे ( सवितः देव ) = सबके उत्पादक व प्रेरक देव! ( एषः सोमः ) = यह सोम—शरीर में आहार से रस-रुधिरादि के क्रम से उत्पन्न होनेवाली यह शक्ति ( ते ) = तेरी प्राप्ति के लिए ही है। ( तं रक्षस्व ) = कृपा करके उस सोम की आप ही रक्षा कीजिए। ये वासनाएँ मुझे तो दबा लेती हैं और इनसे दबने पर मेरे लिए इस सोम का रक्षण सम्भव नहीं होता। कामदेव को आप ही भस्म करेंगे तभी सोमरक्षा सम्भव होगी। ये वासनाएँ ( मा ) = मत ( त्वा ) = आपको ( दभन् ) = हिंसित करनेवाली हों। 

२. इस प्रकार प्रभु से सोमरक्षण के लिए प्रार्थना करके अगस्त्य सोम को ही सम्बोधित करके कहता है कि हे ( देव सोम ) = दिव्य गुणों को जन्म देनेवाले सोम! ( एतत् ) = यह ( त्वम् ) = तू ही ( देवः ) = प्रकाशमय है, ज्योति का कारण है। तू ( देवान् उप अगाः ) = सब देवों को हमारे समीप प्राप्त करा—हमें सब दिव्य गुणों का पुञ्ज बना। 

३. ( इदमहम् ) = यह मैं ( रायस्पोषेण सह ) = धन के पोषण के साथ ( मनुष्यान् उपागाः ) = मनुष्यों के समीप प्राप्त होता हूँ और ( स्वाहा ) = उनके कष्टों को दूर करने के लिए अपने स्व = धन का हा = त्याग करता हूँ। यहाँ मन्त्रार्थ से यह बात स्पष्ट है कि लोकसेवा के लिए भी धन की आवश्यकता है। 

४. इस प्रकार लोकसेवा करता हुआ मैं ( वरुणस्य ) = वरुण के ( पाशात् ) = पाश से ( निर्मुच्ये ) = निर्मुक्त होता हूँ। वरुण के बन्धनों से छूटता हूँ। बन्धनमुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता हूँ। वस्तुतः लोकसेवा ही मोक्ष का साधन है।
Essence
भावार्थ — [ क ] प्रभुकृपा से मैं सोम की रक्षा करता हूँ। [ ख ] सोमरक्षा से दैवी सम्पत्ति का वर्धन होता है। [ ग ] मैं धनार्जन करके मनुष्यों के दुःख-दूरीकरण में धन का विनियोग करता हूँ। [ घ ] और बन्धनों से मुक्त होकर ‘ब्रह्मनिर्वाण’ को प्राप्त करता हूँ।
Subject
लोकसेवा व बन्धनविच्छेद