Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 32

43 Mantra
5/32
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- स्वराट् ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒शिग॑सि क॒विरङ्घा॑रिरसि॒ बम्भा॑रिरव॒स्यूर॑सि दुव॑स्वाञ्छु॒न्ध्यूर॑सि मार्जा॒लीयः॑। स॒म्राड॑सि कृ॒शानुः॑ परि॒षद्यो॑ऽसि॒ पव॑मानो॒ नभो॑ऽसि प्र॒तक्वा॑ मृ॒ष्टोऽसि हव्य॒सूद॑नऽऋ॒तधा॑मासि॒ स्वर्ज्योतिः॥३२॥

उ॒शिक्। अ॒सि॒। क॒विः। अङ्घा॑रिः। अ॒सि॒। बम्भा॑रिः। अ॒व॒स्यूः। अ॒सि॒। दुव॑स्वान्। शु॒न्ध्यूः। अ॒सि॒। मा॒र्जा॒लीयः॑। स॒म्राडिति॑ स॒म्ऽराट्। अ॒सि॒। कृ॒शानुः॑। प॒रि॒षद्यः॑। प॒रि॒षद्य॒ इति॑ परि॒ऽसद्यः॑। अ॒सि॒। पव॑मानः। नभः॑। अ॒सि॒। प्र॒तक्वेति॑ प्र॒ऽतक्वा॑। मृ॒ष्टः। अ॒सि॒। ह॒व्य॒सूद॑न॒ इति॑ हव्य॒ऽसूद॑नः। ऋ॒तधा॒मेत्यृ॒तऽधा॑मा। अ॒सि॒। स्व॑र्ज्योति॒रिति॒ स्वः॑ऽज्योतिः॑ ॥३२॥

Mantra without Swara
उशिगसि कविरङ्ङ्घारिरसि बम्भारिरवस्यूरसि दुवस्वाञ्छुन्ध्यूरसि मार्जालीयः सम्राडसि कृशानुः परिषद्यो सि पवमानो नभोसि प्रतक्वा मृष्टोसि हव्यसूदनऽऋतधामासि स्वर्ज्यातिः समुद्रोसि ॥

उशिक्। असि। कविः। अङ्घारिः। असि। बम्भारिः। अवस्यूः। असि। दुवस्वान्। शुन्ध्यूः। असि। मार्जालीयः। सम्राडिति सम्ऽराट्। असि। कृशानुः। परिषद्यः। परिषद्य इति परिऽसद्यः। असि। पवमानः। नभः। असि। प्रतक्वेति प्रऽतक्वा। मृष्टः। असि। हव्यसूदन इति हव्यऽसूदनः। ऋतधामेत्यृतऽधामा। असि। स्वर्ज्योतिरिति स्वःऽज्योतिः॥३२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे प्रभो! आप ( उशिक् असि ) = [ वष्टि ] सब जीवों का भला चाहनेवाले हैं, ( कविः ) = [ कौति सर्वा विद्याः ] सृष्टि के आरम्भ में ही सम्पूर्ण ज्ञानों के देनेवाले हैं। इस ज्ञान के द्वारा ही आप कल्याण करते हैं। देवों के रक्षण का प्रकार यह है कि जिसका हित चाहते हैं, उसे सद्बुद्धि प्राप्त कराते हैं। 

२. ( अङ्घारिः असि ) = [ अंहसां अरिः ] आप पापों के शत्रु हैं और इस प्रकार ( बम्भारिः ) = [ बिभर्ति विश्वम् ] विश्व का पालन करनेवाले हैं। विश्व का सच्चा पालन तो पाप-नाश से ही होता है। किसी व्यक्ति का सच्चा भरण यही है कि उसकी पापवृत्ति को दूर कर दिया जाए। 

३. ( अवस्यूः असि ) = [ अवः अन्नमिच्छति, रक्षणं वा ] आप सबके लिए अन्न चाहनेवाले हैं। इस अन्न के द्वारा सबका रक्षण चाहते हैं और ( दुवस्वान् ) = हविष्मान् हैं [ दुव इति हविर्नाम ]। वस्तुतः जब हम इन देवों से प्राप्त अन्नों को हविरूप बनाकर यज्ञ में आहुति देते हैं तब ये देव उन हवियों से भावित होकर हमें फिर अन्न प्राप्त कराते हैं। प्रभु हमें अन्न प्राप्त कराने के लिए हवि देनेवाला बनाते हैं। 

४. ( शुन्ध्यूः असि ) = [ शुद्धः, शुन्धयति ] आप पूर्ण शुद्ध हैं, और अतएव ( मार्जालीयः ) = [ मार्ष्टि ] शुद्ध करनेवाले हैं। 

५. ( सम्राट् असि ) = [ सम्यग्राजते ] आप अपनी शक्ति से देदीप्यमान हैं और ( कृशानुः ) = [ शत्रुं कर्शयति ] शत्रुओं के क्षीण करनेवाले तथा [ कृशम् आनयति ] दुर्बलों को प्राणित करनेवाले हैं। शक्ति के दो सुन्दर प्रयोग हैं। [ क ] शत्रुओं को कृश करना तथा [ ख ] निर्बलों को प्रोत्साहित करना। 

६. ( परिषद्यः असि ) = [ परि सीदन्ति इति, तेषु साधुः ] चारों ओर होनेवालों में उत्तम हैं। दिशा-काल-आकाश आदि हमारे चारों ओर होनेवाले पदार्थों में प्रभु उत्तम हैं। ये हमारे चारों ओर होकर हमें मृत्यु से बचाते हैं, ( पवमानः ) = हमारे जीवनों को पवित्र करते हैं। जब उपासक अपने को प्रभु में अनुभव करता है तब उसकी पापवृत्ति शान्त हो जाती है।

७. ( नभः असि ) = [ नभ् = to kill, nip ] आप सब विघ्नों की हिंसा करनेवाले हैं और ( प्रतक्वा ) = प्रकृष्ट गतिवाले हैं। प्रभु उपासकों के मार्ग के विघ्नों को हिंसित करके उन्हें उन्नति-पथ पर आगे ले-चलते हैं। 

८. ( मृष्टो असि ) = [ मृष् तितिक्षायाम् ] अत्यन्त सहनशील हैं और ( हव्यसूदनः ) = [ सूदः+पाचकः ] दानपूर्वक अदन के योग्य पदार्थों के पकानेवाले हैं। वस्तुतः हव्य पदार्थों के प्रयोग द्वारा हमें सहनशील बनना है। 

८. ( ऋतधामा असि ) = ऋत के आप धारण करनेवाले हैं और ( स्वर्ज्योतिः ) = स्वयं देदीप्यमान ज्योति हैं। जो भी ऋत का पालन करता है वह ज्योतिर्मय जीवनवाला बनता है।
Essence
भावार्थ — हे प्रभो! ‘उशिग्’ आदि शब्दों से आपका स्मरण करता हुआ मैं भी वैसा ही बन पाऊँ।
Subject
ऋतधाम स्वर्ज्योतिः