Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 31

43 Mantra
5/31
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- विराट् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वि॒भूर॑सि प्र॒वाह॑णो॒ वह्नि॑रसि हव्य॒वाह॑नः। श्वा॒त्रोऽसि प्रचे॑तास्तु॒थोऽसि वि॒श्ववे॑दाः॥३१॥

वि॒भूरिति॒ वि॒ऽभूः। अ॒सि॒। प्रवा॒ह॑णः। प्रवा॒ह॑न॒ इति॑ प्र॒ऽवाह॑नः। वह्निः॑। अ॒सि॒। ह॒व्य॒वाह॑न॒ इति॑ हव्य॒ऽवाह॑नः। श्वा॒त्रः। अ॒सि॒। प्रचे॑ता॒ इति॒ प्रऽचे॑ताः। तु॒थः। अ॒सि॒। वि॒श्ववे॑दा॒ इति॑ वि॒श्वऽवे॑दाः ॥३१॥

Mantra without Swara
विभूरसि प्रवाहणो वह्निरसि हव्यवाहनः श्वात्रो सि प्रचेतास्तुथोसि विश्ववेदाः ॥

विभूरिति विऽभूः। असि। प्रवाहणः। प्रवाहन इति प्रऽवाहनः। वह्निः। असि। हव्यवाहन इति हव्यऽवाहनः। श्वात्रः। असि। प्रचेता इति प्रऽचेताः। तुथः। असि। विश्ववेदा इति विश्वऽवेदाः॥३१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र के अनुसार प्रभु के साथ अभिन्न हो जाने की कामनावाला मधुच्छन्दा प्रभु-स्तवन करता हुआ कहता है कि— १. हे प्रभो! ( विभूः असि ) = [ वि-भवति ] आप सर्वव्यापक हो, सब वैभवोंवाले हो [ विभव = विभूति ], ( प्रवाहणः ) = सारे संसार के संचालक हो। इस संसार को गति देनेवाले आप ही हैं। ये अत्यन्त तीव्र गति में चलते हुए पिण्ड आपसे ही गति पा रहे हैं। 

२. आप ( वह्निः असि ) = सारे संसार का वहन व धारण करनेवाले हैं, ( हव्यवाहनः ) = सब प्राणियों के लिए हव्यों को प्राप्त करानेवाले हैं। हव्य पदार्थ का अभिप्राय ‘दानपूर्वक अदन’ है। आप हमें उन-उन आवश्यक पदार्थों को प्राप्त कराते हैं जिनका त्यागपूर्वक उपभोग करते हुए हम अपने जीवनों का ठीक धारण कर सकें। 

३. ( श्वात्रः असि ) = [ शु क्षिप्रम् अतति—म० ] आप शीघ्र गतिवाले हैं। आपके कर्मों में एक क्षण का भी विलम्ब नहीं होता। [ श्वि = गतिवृद्धि+त्रा ] आप गतिशील हैं, सदा वर्धमान हैं और त्राण [ रक्षा ] करनेवाले हैं। ( प्रचेताः ) = आप प्रकृष्ट ज्ञानवाले हैं। इस प्रकृष्ट ज्ञान के कारण ही आप की प्रत्येक क्रिया जीव की वृद्धि का कारण है। 

४. ( तुथः असि ) = [ to have authority or power ] आप ही ईशान हो, [ to be strong ] आप शक्तिशाली हो, [ to get ] आप सभी को प्राप्त हुए-हुए हो, [ to increase ] सदा वर्धमान हो, [ to go, move ] सम्पूर्ण गति के देनेवाले हो, [ to strike ] अन्त में सारे संसार का संहार करनेवाले हो और ( विश्ववेदाः ) = सम्पूर्ण धनोंवाले आप ही हो।
Essence
भावार्थ — प्रभु सब वैभवोंवाले, सर्वसंसारवाहक, शीघ्र गतिवाले व सदा वृद्ध हैं।
Subject
मधुच्छन्दा का प्रभु-स्तवन