Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 30

43 Mantra
5/30
Devata- ईश्वरसभाध्यक्षौ देवते Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- आर्ची उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
इन्द्र॑स्य॒ स्यूर॒सीन्द्र॑स्य ध्रु॒वोऽसि ऐ॒न्द्रम॑सि वैश्वदे॒वम॑सि॥३०॥

इन्द्र॑स्य। स्यूः। अ॒सि॒। इन्द्र॑स्य। ध्रु॒वः। अ॒सि॒। ऐ॒न्द्रम्। अ॒सि॒। वै॒श्व॒दे॒वमिति॑ वैश्वऽदे॒वम्। अ॒सि॒ ॥३०॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य स्यूरसीन्द्रस्य धु्रवोसि ऐन्द्रमसि वैश्वदेवमसि ॥

इन्द्रस्य। स्यूः। असि। इन्द्रस्य। ध्रुवः। असि। ऐन्द्रम्। असि। वैश्वदेवमिति वैश्वऽदेवम्। असि॥३०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में ‘दीर्घतमा’ ऋषि का प्रभु-स्तवन समाप्त हुआ है। उसकी कामना यही रही है कि मेरी वाणियाँ सब ओर से हटकर प्रभु का ही स्तवन करनेवाली बनें। इससे उत्तम और कामना हो भी क्या सकती है? इस उत्तम कामनावाला यह अब ‘मधुच्छन्दाः’ बन जाता है—उत्तम इच्छाओंवाला। दूसरे शब्दों में दीर्घतमा = अज्ञान का विदारण करनेवाला मधुच्छन्दा—उत्तम इच्छाओंवाला बनकर अपने से कहता है कि— १. तू ( इन्द्रस्य ) = परमैश्वर्यशाली प्रभु को ( स्यूः ) = अपने साथ सी लेनेवाला ( असि ) = है। तूने उस प्रभु को अपने साथ जोड़ा है। 

२. ( इन्द्रस्य ध्रुवः असि ) = तू इन्द्र के ध्रुववाला है, अर्थात् तेरी सारी क्रियाएँ उस इन्द्र के ही चारों ओर घूमती हैं। ‘इन्द्र का तू ध्रुव है’ यह अर्थ करने पर भी भावना यही है कि तू चारों ओर प्रभु से आवृत है। 

३. ( ऐन्द्रम् असि ) = प्रभु के निरन्तर सम्पर्क के कारण तू भी परमैश्वर्य का अधिकरण बना है और ( वैश्वदेवम् असि ) = सब दिव्य गुणों का तू अधिकरण हुआ है, अर्थात् ‘सतत प्रभु उपासन’ का तेरे जीवन पर यह प्रभाव हुआ है कि तू जहाँ परमैश्वर्य का अधिष्ठान बना है वहाँ सब दिव्य गुणों का भी निवासस्थान हुआ है। ऐश्वर्य व दिव्य गुणों को प्राप्त करके तू भी बहुत कुछ उस प्रभु-जैसा हो गया है। उपासना का यह परिणाम होना ही चाहिए था।
Essence
भावार्थ — मधुच्छन्दा प्रार्थना करता है कि मैं प्रभु के साथ सिल जाऊँ। उससे अलग हो ही न सकूँ। प्रभु ही मेरे ध्रुव हों—केन्द्रबिन्दु हों। मेरी सारी क्रियाएँ उन्हीं के चारों ओर घूमें जिससे मैं भी परमैश्वर्य व दिव्य गुणों का अधिकरण बनूँ।
Subject
प्रभु के साथ सिल जाना [ इन्द्रस्य स्यूः ]