Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 20

43 Mantra
5/20
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- विराट् आर्ची त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र तद्विष्णु॑ स्तवते वी॒र्य्येण मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः। यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्रम॑णेष्वधिक्षि॒यन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥२०॥

प्र। तत्। विष्णुः॑। स्त॒व॒ते॒। वी॒र्ये᳖ण। मृ॒गः। न। भी॒मः। कु॒च॒रः। गि॒रि॒ष्ठाः। गि॒रि॒स्था इति॑ गिरि॒ऽस्थाः। यस्य॑। उ॒रुषु॑। त्रि॒षु। वि॒क्रम॑णे॒ष्विति॑ वि॒ऽक्रम॑णेषु। अ॒धि॒क्षि॒यन्तीत्य॑धिऽक्षि॒यन्ति॑। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥२०॥

Mantra without Swara
प्र तद्विष्णु स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥

प्र। तत्। विष्णुः। स्तवते। वीर्येण। मृगः। न। भीमः। कुचरः। गिरिष्ठाः। गिरिस्था इति गिरिऽस्थाः। यस्य। उरुषु। त्रिषु। विक्रमणेष्विति विऽक्रमणेषु। अधिक्षियन्तीत्यधिऽक्षियन्ति। भुवनानि। विश्वा॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वह ( विष्णुः ) = सर्वव्यापक प्रभु ( मृगः ) = [ मार्ष्टि ] हमारे जीवन का शोधन करनेवाले हैं। प्रभु के स्मरण से वासनाओं का विनाश हो जाता है।( न भीमः ) = वे प्रभु हमारे लिए भयंकर नहीं हैं, वे तो पुत्रों के लिए पिता के समान हैं। ( कुचरः ) = [ कौ चरति ] वे प्रभु सम्पूर्ण पृथिवी पर विचरण करनेवाले हैं [ क्वायं चरतीति ]। सर्वव्यापक होते हुए भी न जाने कहाँ हैं। अदृश्य होने से ऐसा ही कहना पड़ता है। ( गिरिष्ठाः ) = वे प्रभु वेदवाणी में स्थित हैं। सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति = सारे वेद उस प्रभु का प्रतिपादन कर रहे हैं। [ देहोऽपि गिरिरुच्यते—उ० ] वे प्रभु ‘इस शरीर में स्थित हैं। आश्चर्य तो यही है कि समीप-से-समीप हमारे ही शरीर में होते हुए दूर-से-दूर हैं—अदृश्य हैं। ये विष्णु वे हैं ( यस्य ) = जिनके ( त्रिषु ) = तीन ( उरुषु ) = विस्तृत ( विक्रमणेषु ) = विक्रमरूप लोकों में ( विश्वानि ) = सब ( भुवनानि ) = [ भूतजातानि ] प्राणी ( अधिक्षियन्ति ) =  निवास करते हैं। ( तत् ) = [ तस्मात् ] अतः वे विष्णु ( वीर्येण प्रस्तवते ) = अपने वीरतापूर्ण कर्मों के कारण स्तुत किये जाते हैं।
Essence
भावार्थ — वे प्रभु हमारे जीवनों को शुद्ध बनाते हैं। क्या भूपृष्ठ पर, क्या पर्वतशिखर पर वे सर्वत्र विद्यमान हैं। ये तीनों लोक प्रभु के ही तीन विक्रमण हैं। इन्हीं में सब प्राणियों का निवास है।
Subject
विष्णु के तीन विक्रमण