Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 17

43 Mantra
5/17
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- स्वराट् ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒व॒श्रुतौ॑ दे॒वेष्वाघो॑षतं॒ प्राची॒ प्रेत॑मध्व॒रं क॒ल्पय॑न्तीऽऊ॒र्ध्वं य॒ज्ञं न॑यतं॒ मा जि॑ह्वरतम्। स्वं गो॒ष्ठमाव॑दतं देवी दुर्ये॒ऽआयु॒र्मा निर्वा॒दिष्टं प्र॒जां मा निर्वा॑दिष्ट॒मत्र॑ रमेथां॒ वर्ष्म॑न् पृथि॒व्याः॥१७॥

दे॒व॒श्रुता॒विति॑ देव॒ऽश्रुतौ॑। दे॒वेषु॑। आ। घो॒ष॒त॒म्। प्राची॒ऽइति॒ प्राची॑। प्र। इ॒त॒म्। अ॒ध्व॒रम्। क॒ल्पय॑न्तीऽइति॑ क॒ल्पय॑न्ती। ऊ॒र्ध्वम्। य॒ज्ञम्। न॒य॒त॒म्। मा। जि॒ह्व॒र॒त॒म्। स्वम्। गो॒ष्ठम्। गो॒स्थमिति॑ गो॒ऽस्थम्। आ। व॒द॒त॒म्। दे॒वी॒ऽइति॑ देवी। दु॒र्ये॒ऽइति॑ दुर्ये। आयुः॑। मा। निः। वा॒दि॒ष्ट॒म्। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। मा। निः। वा॒दि॒ष्ट॒म्। अत्र॑। र॒मे॒था॒म्। वर्ष्म॑न्। पृ॒थि॒व्याः ॥१७॥

Mantra without Swara
देवश्रुतौ देवेष्वा घोषतम्प्राची प्रेतमध्वरङ्कल्पयन्तीऽऊर्ध्वं यज्ञन्नयतम्मा जिह्वरतम् । स्वङ्गोष्ठमा वदतन्देवी दुर्येऽआयुर्मा निर्वादिष्टम्प्रजाम्मा निर्वादिष्टमत्र रमेथाँ वर्ष्मन्पृथिव्याः ॥

देवश्रुताविति देवऽश्रुतौ। देवेषु। आ। घोषतम्। प्राचीऽइति प्राची। प्र। इतम्। अध्वरम्। कल्पयन्तीऽइति कल्पयन्ती। ऊर्ध्वम्। यज्ञम्। नयतम्। मा। जिह्वरतम्। स्वम्। गोष्ठम्। गोस्थमिति गोऽस्थम्। आ। वदतम्। देवीऽइति देवी। दुर्येऽइति दुर्ये। आयुः। मा। निः। वादिष्टम्। प्रजामिति प्रऽजाम्। मा। निः। वादिष्टम्। अत्र। रमेथाम्। वर्ष्मन्। पृथिव्याः॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘गत मन्त्र के अनुसार ‘अन्न-दूध’ का ही मननपूर्वक प्रयोग करनेवाले पति-पत्नी कैसे बनते हैं’ यह विषय प्रस्तुत मन्त्र में है — १. ( देवश्रुतौ ) = [ दिव्यविद्याश्रुतौ—द० ] सृष्टि के ३३ देवों के ज्ञान का श्रवण करनेवाले तुम हो। जिन देवों के सम्पर्क में हमें सदा रहना है और वस्तुतः जिन देवों से हमारा शरीर बना है, उनका ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक ही है। 

२. ( देवेषु ) = विद्वानों के चरणों में [ विद्वांसो हि देवाः ] ( आघोषतम् ) = तुम इन ज्ञान की वाणियों का उच्चरण करो। विद्वानों से ३३ देवों का ज्ञान प्राप्त करो। 

३. ( प्राची प्रेतम् ) = [ प्र अञ्च् ] इस प्रकार सदा आगे बढ़ते हुए चलते चलो। हम उन्नतिशील हों, क्रियाशील हों, अकर्मण्य न हो जाएँ। 

४. हम सदा ( अध्वरं कल्पयन्ती ) = हिंसारहित यज्ञों को करनेवाले हों। ( यज्ञम् ) = यज्ञ को ( ऊर्ध्वम् ) = ऊपर ( नयतम् ) = ले-चलो। हमारे यज्ञों में किसी प्रकार का विकार न आ जाए। ५. ( मा जिह्वरतम् ) = किसी तरह की कुटिलता न करो। हमारा जीवन सरल हो।

६. [ क ] ( स्वं गोष्ठम् ) = अपने गोष्ठ को ( आवदतम् ) = चारों ओर प्रख्यात करो। अपने घर की गौशाला को ऐसा सुन्दर बनाओ कि तुम्हारी गौवों की चारों ओर चर्चा हो। [ ख ] अथवा ( स्वम् ) = अपने को ( गोष्ठम् ) = वेदवाणियों का निवासस्थान और परिणामतः देवों का निवासस्थान ( आवदतम् ) = प्रसिद्ध करो। लोगों में तुम्हारे ज्ञान व श्रेष्ठता की ही चर्चा हो। 

७. ( देवी ) = तुम दिव्य गुणोंवाले बनो और इस प्रकार ( दुर्ये ) = घर को उत्तम बनानेवाले होओ। 

८. ( आयुः ) = अपने जीवन को ( मा ) = मत ( निर्वादिष्टम् ) = [ निर् = निन्दायाम् ] निन्दितरूप में उच्चारित कराओ, अर्थात् आपके जीवन की निन्दा न हो। ( प्रजाम् ) = अपनी सन्तान का भी ( मा ) = मत ( निर्वादिष्टम् ) = निन्दित रूप में उच्चारण कराओ, अर्थात् तुम्हारी सन्तान की चारों ओर निन्दा न हो। 

९. इस प्रकार प्रशस्त जीवन व प्रशस्त सन्तानवाले बनकर ( पृथिव्याः ) = इस पृथिवी के ( वर्ष्मन् ) = शरीरभूत देवयजन के स्थान में ( रमेथाम् ) = आनन्द का अनुभव करो, अर्थात् तुम्हारा जीवन यज्ञमय हो। तुम यज्ञस्थान को ही पृथिवी का शरीर समझो। अथवा [ वर्ष्मन् = handsome form ] पृथिवी के सुन्दर रूप में ( रमेथाम् ) = आनन्द का अनुभव करो, पृथिवी = शरीर। तुम दोनों के शरीर बड़े सुन्दर हों। पृथिवी के देवयजन में स्थित होकर ये प्रभु का स्तवन करते हैं।
Essence
भावार्थ — हम देवश्रुत बनें, जीवन में यज्ञ को ऊँचा स्थान दें, कुटिलता से दूर रहें, इस प्रकार अपने जीवन व प्रजा को सुन्दर बनाएँ और अपने सुन्दर शरीरों में आनन्द का अनुभव करें अथवा इस पृथिवी के देवयजनों में ही आनन्द का अनुभव करें।
Subject
यज्ञ का ऊर्ध्वनयन