Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 16

43 Mantra
5/16
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- स्वराट् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒रा॑वती धेनु॒मती॒ हि भू॒तꣳ सूय॑व॒सिनी॒ मन॑वे दश॒स्या। व्य॑स्कभ्ना॒ रोद॑सी विष्णवे॒ते दा॒धर्त्थ॑ पृथि॒वीम॒भितो॑ म॒यूखैः॒ स्वाहा॑॥१६॥

इरा॑वती॒ इतीरा॑ऽवती। धे॒नु॒मती॒ इति॑ धे॒नु॒ऽमती॑। हि। भू॒तम्। सू॒य॒व॒सिनी॑। सु॒य॒व॒सिनी॒ इति॑ सु॒ऽयव॒सिनी॑। मन॑वे। द॒श॒स्या। वि। अ॒स्क॒भ्नाः॒। रोद॑सी॒ इति॒ रोद॑सी। वि॒ष्णो॒ऽइति॑ विष्णो। ए॒तेऽइत्ये॒ते॑। दा॒धर्त्थ॑। पृ॒थि॒वीम्। अ॒भितः॑। म॒यूखैः॑। स्वाहा॑ ॥१६॥

Mantra without Swara
इरावती धेनुमती हि भूतँ सूयवसिनी मनवे दशस्या । व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा ॥

इरावती इतीराऽवती। धेनुमती इति धेनुऽमती। हि। भूतम्। सूयवसिनी। सुयवसिनी इति सुऽयवसिनी। मनवे। दशस्या। वि। अस्कभ्नाः। रोदसी इति रोदसी। विष्णोऽइति विष्णो। एतेऽइत्येते। दाधर्त्थ। पृथिवीम्। अभितः। मयूखैः। स्वाहा॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में विष्णु द्वारा संसार के निर्माण का उल्लेख है। इस संसार में मनुष्य को वसिष्ठ = वशियों में श्रेष्ठ व उत्तम निवासवाला बनना है। यह वसिष्ठ निम्नरूप में आराधन करता है—हे ( रोदसी ) = द्युलोक व पृथिवीलोक! तुम दोनों ( इरावती ) = [ इरा = अन्न—नि० २।७ ] प्रशस्त अन्नवाले होओ तथा ( हि ) = साथ ही ( धेनुमती ) = प्रशस्त दुधारू गौवोंवाले ( भूतम् ) = होओ। ( सूयवसिनी ) = उन गौ इत्यादि पशुओं के लिए उत्तम यवस - [ = चरी ] - वाले होओ। ( मनवे ) = मननशील ज्ञानी के लिए ( दशस्या ) = सब उत्तम वस्तुओं के देनेवाले होओ।

२. हे ( विष्णो ) = व्यापक प्रभो! आप ( एते ) = इन ( रोदसी ) = द्युलोक व पृथिवीलोक को ( व्यस्कभ्ना ) = विशेषरूप से अलग-अलग थामे हुए हो और ( पृथिवीम् ) = इस विशाल अन्तरिक्ष को [ नि० १।३ ] ( अभितः ) = सब ओर ( मयूखैः ) = किरणों से ( दाधर्थ ) = आप ही धारण व पोषणवाला करते हो। इस विशाल अन्तरिक्ष में किरणों के द्वारा सारे वायुमण्डल में प्राणदायी तत्त्वों का समावेश होता है, जिससे सब प्राणी जीवनीशक्ति प्राप्त करते हैं।
Essence
भावार्थ — मनुष्य इस सृष्टि में सब वस्तुओं का विचारपूर्वक प्रयोग करे। अन्न व दूध ही उसके भोजन हैं। अधिक-से-अधिक खुले में रहने का प्रयत्न करे। यह अन्तरिक्ष प्राणशक्ति से भरा हुआ है।
Subject
इरावती-धेनुमती [ अन्न, दूध ]