Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 10

43 Mantra
5/10
Devata- वाग्देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- ब्राह्मी उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सि॒ह्यसि सपत्नसा॒ही दे॒वेभ्यः॑ कल्पस्व सि॒ह्यसि सपत्नसा॒ही दे॒वेभ्यः॑ शुन्धस्व सि॒ह्यसि सपत्नसा॒ही दे॒वेभ्यः॑ शुम्भस्व॥१०॥

सि॒ꣳही। अ॒सि॒। स॒प॒त्न॒सा॒ही। स॒प॒त्न॒सहीति॑ सपत्न॒ऽसही। दे॒वेभ्यः॑। क॒ल्प॒स्व॒। सि॒ꣳही। अ॒सि॒। स॒प॒त्न॒सा॒ही। स॒प॒त्न॒स॒हीति॑ सपत्नऽस॒ही। दे॒वेभ्यः॑। शु॒न्ध॒स्व॒। सि॒ꣳही। अ॒सि॒। स॒प॒त्न॒सा॒ही। स॒प॒त्न॒स॒हीति॑ सपत्नऽस॒ही। दे॒वेभ्यः॑। शु॒म्भ॒स्व॒ ॥१०॥

Mantra without Swara
सिँह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः कल्पस्व सिँह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व सिँह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुम्भस्व ॥

सिꣳही। असि। सपत्नसाही। सपत्नसहीति सपत्नऽसही। देवेभ्यः। कल्पस्व। सिꣳही। असि। सपत्नसाही। सपत्नसहीति सपत्नऽसही। देवेभ्यः। शुन्धस्व। सिꣳही। असि। सपत्नसाही। सपत्नसहीति सपत्नऽसही। देवेभ्यः। शुम्भस्व॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में सोम [ अग्नि ] के द्वारा शरीरों से सब मलों को दूर करके दिव्य गुणों की प्राप्ति का उल्लेख था। इस सोम की रक्षा करनेवाला अपनी ज्ञानाग्नि को दीप्त करके वेदवाणी का अध्ययन करता है और उस वेदवाणी से कहता है कि तू ( सिंही असि ) = सब बुराइयों की हिंसा करनेवाली है [ हिनस्ति दोषान् ] और सब ज्ञानों का सेवन करनेवाली है [ सिञ्चति—द० ]। ( सपत्नसाही ) = इस ज्ञान-सेचन के द्वारा काम-क्रोध आदि शत्रुओं का पराभव करनेवाली है। इस प्रकार सिंही और सपत्नसाही बनकर तू ( देवेभ्यः ) = देवों के लिए ( कल्पस्व ) = सामर्थ्य देनेवाली हो। 

२. तू ( सिंही असि ) = बुराइयों की हिंसा करनेवाली, ज्ञान का सेचन करनेवाली व ( सपत्नसाही ) = कामादि का पराभव करनेवाली है तू ( देवेभ्यः ) = देवों के लिए ( शुन्धस्व ) = शोधन करनेवाली हो। 

३. तू ( सिंही असि सपत्नसाही ) = बुराइयों को नष्ट करनेवाली ज्ञान का सेचन करनेवाली तथा कामादि का पराभव करनेवाली है ( देवेभ्यः ) = देवताओं के लिए ( शुम्भस्व ) = जीवन को सुशोभित व अलंकृत करनेवाली हो।
Essence
भावार्थ — वेदवाणी बुराइयों को नष्ट करती है, ज्ञान का सेचन करती है, कामादि का पराभव करती है। बुराइयों को नष्ट करके यह हमें सबल बनाती है, ज्ञान-सेचन से यह हमारा शोधन करती है। कामादि के पराभव से यह हमारे जीवन को अलंकृत करती है।
Subject
सिंही - सपत्नसाही