Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 40 / Mantra 9

17 Mantra
40/9
Devata- आत्मा देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒न्धन्तमः॒ प्र वि॑शन्ति॒ येऽस॑म्भूतिमु॒पास॑ते।ततो॒ भूय॑ऽइव॒ ते तमो॒ यऽउ॒ सम्भू॑त्या र॒ताः॥९॥

अ॒न्धम्। तमः॑। प्र। वि॒श॒न्ति॒। ये। अस॑म्भूति॒मित्यस॑म्ऽभूतिम्। उ॒पास॑त॒ इत्यु॑प॒ऽआस॑ते ॥ ततः॑। भूय॑ऽइ॒वेति॒ भूयः॑ऽइव। ते। तमः॑। ये। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। सम्भू॑त्या॒मिति॒ सम्ऽभू॑त्या॒म्। र॒ताः ॥९ ॥

Mantra without Swara
अन्धन्तमः प्र विशन्ति येसम्भूतिमुपासते । ततो भूयऽइव ते तमो यऽउ सम्भूत्याँ रताः ॥

अन्धम्। तमः। प्र। विशन्ति। ये। असम्भूतिमित्यसम्ऽभूतिम्। उपासत इत्युपऽआसते॥ ततः। भूयऽइवेति भूयःऽइव। ते। तमः। ये। ऊँऽइत्यूँ। सम्भूत्यामिति सम्ऽभूत्याम्। रताः॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (‘सम्') = शब्द का अर्थ होता है 'मिलकर' और (भूति) = होना। मिलकर होना, अर्थात् व्यक्तित्व को अलग न समझकर समाज को ही सब कुछ समझना 'सम्भूति' है। इसके विपरीत व्यक्ति को ही प्रधानता दे देना 'असम्भूति' है, इसमें व्यक्ति केवल निजहित को देखता है, सामाजिक हित को वह उपेक्षित कर देता है। २. मन्त्र में कहते हैं कि (ये) = जो (असम्भूतिम्) = व्यक्तिवाद की (उपासते) = उपासना करते हैं, वे (अन्धन्तमः) = घने अँधेरे में (प्रविशन्ति) = प्रवेश करते हैं, ४. परन्तु क्या अकेला समाजवाद कल्याण कर सकता है ? उत्तर यह है कि कल्याण का प्रश्न तो दूर रहा (ये) = जो (सम्भूत्याम्) = समाजवाद में (रता:) = फँसे हुए हैं (ते) = वे (ततः) = उस व्यक्तिवादी की अपेक्षा भूय इव कुछ अधिक ही (तम:) = अँधेरे में [प्रविशन्ति] पहुँचते है। केवल समाजवादियों की गति व्यक्तिवादियों से अधिक हीन होती है। कारण यह कि व्यक्ति को बिलकुल उपेक्षित कर देने के कारण व्यक्ति की उन्नति समाप्त हो जाती है और व्यक्ति ने ही समाज को बनाना है। व्यक्ति की निर्बलता का परिणाम यह होता है कि समाज एकदम निर्बल हो जाता है।
Essence
भावार्थ-व्यक्तिवादी अन्धकार में जाता है तो समाजवादी और भी अधिक अन्धकार में।
Subject
अँधेरा और घना अँधेरा