Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 40 / Mantra 15

17 Mantra
40/15
Devata- आत्मा देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वा॒युरनि॑लम॒मृत॒मथे॒दं भस्मा॑न्त॒ꣳ शरी॑रम्।ओ३म् क्रतो॑ स्मर। क्लि॒बे स्म॑र। कृ॒तꣳ स्म॑र॥१५॥

वा॒युः। अनि॑लम्। अ॒मृत॑म्। अथ॑। इ॒दम्। भस्मा॑न्त॒मिति॒ भस्म॑ऽअन्तम्। शरी॑रम् ॥ ओ३म्। क्रतो॒ इति॒ क्रतो॑। स्म॒र॒। क्लि॒बे। स्म॒र॒। कृ॒तम्। स्म॒र॒ ॥१५ ॥

Mantra without Swara
वायुरनिलममृतमथेदम्भस्मान्तँ शरीरम् । ओ३म् । क्रतो स्मर । क्लिबे स्मर । कृतँ स्मर ॥

वायुः। अनिलम्। अमृतम्। अथ। इदम्। भस्मान्तमिति भस्मऽअन्तम्। शरीरम्॥ ओ३म्। क्रतो इति क्रतो। स्मर। क्लिबे। स्मर। कृतम्। स्मर॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१ 'आत्मा' शब्द ' अत्- गतौ' धातु से बना है, इसका ठीक पर्यायवाची शब्द 'वा- गतौ' से बना हुआ 'वायु' है। ये दोनों ही शब्द जीव को उसके स्वभाव की सूचना दे रहे हैं, जैसे अग्नि का स्वभाव उष्णता है, उष्णता के बिना अग्नि कुछ नहीं, इसी प्रकार 'जीव हो और गतिशील न हो' यह नहीं हो सकता। वह तो 'आत्मा' है, वह 'वायु' है। यह आत्मा ('अनिलम्') = [न+इला] पार्थिव नहीं, भौतिक नहीं। पार्थिव न होने से ही तो यह (अमृतम्) = अविनश्वर है। भौतिक वस्तु नश्वर है, अभौतिक अनश्वर । इस प्रकार संकेत इस बात का भी हो गया है कि यदि हम भौतिकता से ऊपर उठेंगे तो मृत्यु से भी बच पाएँगे। साथ ही यह अनुभव सिद्ध बात है कि अति भोजन हमें लेटने के लिए बाधित करता है, मित भोजन हमारे जीवन में स्फूर्ति का कारण बनता है, एवं 'वायु' और 'अमृतम्' के बीच में पड़ा हुआ ' अनिलम्' शब्द दोनों बातों का संकेत कर रहा है कि [क] अपार्थिवता, अभौतिकता हमें अधिक क्रियाशील बनाती है, और [ख] यही अभौतिकता हमें मृत्यु से भी बचाती है। २. 'हमारी प्रवृत्ति भौतिक न हो' इसके लिए शरीर के स्वरूप का चिन्तन कितना सहायक हो जाता है ? अतः मन्त्र में कहते है (अथ) = आत्मा अमर है तो, अब (इदम् शरीरम्) = यह शरीर (भस्मान्तम्) = भस्मरूप परिणामवाला है। इस मिट्टी में मिल जानेवाले शरीर के भोगों के लिए ऐसा लालायित क्यों होना? जिसने साथ नहीं देना उसके लिए इतना भी क्या हाथ-पैर मारना ? ३. हे (क्रतो) = [क्रतु यज्ञ, क्रतु = Power] = यज्ञादि कर्मों के द्वारा शक्ति का सञ्चय करनेवाले जीव (ओ३म् स्मर) = तू उस रक्षक प्रभु का स्मरण कर इसका स्मरण ही तुझे भोगों में फँसने से बचने की शक्ति देगा । (क्लिबे स्मर) = तू इसलिए स्मरण कर क्योंकि तुझे शक्ति प्राप्त हो। 'क्लृपू सामर्थ्ये' से बना 'क्लिब्' शब्द सामर्थ्य का वाचक है। प्रभु स्मरण से शक्ति प्राप्त होती है। आचार्य दयानन्द प्रातः सायं दोनों समय प्रभु से अपना सम्पर्क स्थापित करके अपने जीवन की बैटरी को फिर से भर लेते थे। इस शक्ति को प्राप्त करके तू अपने (कृतम्) = [नपुंसके भावे क्तः] = कर्त्तव्य-कर्म का (स्मर) = स्मरण कर । 'प्रभु स्मरण से शक्ति, शक्ति से कर्म' यह है क्रम जो इस कार्यकारणभाव को स्पष्ट कर रहा है। हमने अधिकार चर्चाएँ नहीं करनी, कर्त्तव्य का ही स्मरण करना है। हमारा तो वस्तुतः अधिकार भी कर्त्तव्य- स्मरणमात्र है।
Essence
भावार्थ- आत्मा की अपार्थिवता को और शरीर की भस्मान्तता को स्मरण करें, जिससे हमारा जीवन भोगप्रधान न हो। प्रभु का स्मरण करें, जिससे शक्ति प्राप्त करके अपने कर्त्तव्य को सुचारुरूपेण निभा सकें।
Subject
शरीर व आत्मा का स्वरूप