Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 8

37 Mantra
4/8
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- आत्रेय ऋषिः Chhand- आर्षी अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
विश्वो॑ दे॒वस्य॑ ने॒तुर्मर्त्तो॑ वुरीत स॒ख्यम्। विश्वो॑ रा॒यऽइ॑षुध्यति द्यु॒म्नं वृ॑णीत पु॒ष्यसे॒ स्वाहा॑॥८॥

विश्वः॑। दे॒वस्य॑। ने॒तुः। मर्त्तः॑। वु॒री॒त॒। स॒ख्यम्। विश्वः॑। रा॒ये। इ॒षु॒ध्य॒ति॒। द्यु॒म्नम्। वृ॒णी॒त॒। पु॒ष्यसे॑। स्वाहा॑ ॥८॥

Mantra without Swara
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्ता वुरीत सख्यम् । विश्वो राय इषुध्यति द्युम्नँ वृणीत पुष्यसे स्वाहा ॥

विश्वः। देवस्य। नेतुः। मर्त्तः। वुरीत। सख्यम्। विश्वः। राये। इषुध्यति। द्युम्नम्। वृणीत। पुष्यसे। स्वाहा॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में ‘प्रजापति’ का उल्लेख है। प्रजापति वही बन सकता है जो संसार के प्रलोभनों में न फँसकर प्रभु का वरण करता है। यह प्रभु का वरण करनेवाला ‘आत्रेय’ होता है। यह काम-क्रोध-लोभ तीनों से रहित होता है। इन आत्रेयों से प्रभु कहते हैं कि २. ( विश्वः मर्तः ) = संसार में प्रविष्ट प्रत्येक मनुष्य ( नेतुः ) = संसार-चक्र के सञ्चालक ( देवस्य ) =  दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभु की ( सख्यम् ) = मित्रता को ( वुरीत ) = वरण करे, चाहे। प्रभु की इस मित्रता ने ही उसे इस प्रलोभनमय संसार में फँसने से बचाना है। प्रभु की मित्रता ही उसे वह शक्ति प्राप्त कराती है जो उसे ‘काम-क्रोध-लोभ’ तीनों का संहार करने में समर्थ करती है। एवं, प्रभु की मित्रता उसे ‘आत्रेय’ बनाती है। 

३. सामान्यतः संसार की स्थिति इससे भिन्न है। ( विश्वः ) = सब कोई ( रायः ) = धनों को ( इषुध्यति ) = माँगता है, चाहता है। धन की उपासना अधिक है प्रभु की कम। वस्तुतः ‘हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्’ = इस स्वर्णमय संसार के पदार्थों से सत्यस्वरूप परमात्मा का रूप ढका हुआ है। धन अधिक आकर्षक है। संसार में धन की ही महिमा दिखती है, अतः धन की ओर झुकाव स्वाभाविक है, परन्तु इसकी ओर झुककर मनुष्य अन्ततः इसका दास बन जाता है। धन का दास बना और फिर मनुष्य निधन = मृत्यु की ओर ही बढ़ता है, अतः हमें प्रभु का ही वरण करना चाहिए, धन का नहीं। 

४. परन्तु धन के बिना खाना-पीना भी सम्भव नहीं, अतः मन्त्र में कहते हैं कि ( द्युम्नम् ) = [ Wealth ] धन का ( वृणीत ) = वरण करो, परन्तु ( पुष्यसे ) = उतने ही धन का जितना कि पोषण के लिए पर्याप्त हो। इतना धन तो हाथ-पैर हिलानेवाले को प्रभुकृपा से प्राप्त हो ही जाता है। एवं, प्रभु का वरण ही ठीक है। धन का वरण मनुष्य को विलासी बना देता है। दूसरी ओर स्रष्टा के वरण में जहाँ मोक्ष मिलता है वहाँ जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक सृष्टि का अंश भी मिलता है।
Essence
भावार्थ — हम धन का वरण न करके प्रभु का वरण करें।
Subject
स्रष्टा व सृष्टि, God vs Mammon