Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 7

37 Mantra
4/7
Devata- अग्निर्देवता । आपो देवता । बृहस्पतिर्देवता । Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- पङ्क्ति,आर्षी बृहती, Swara- पञ्चमः, मध्यमः
Mantra with Swara
आकू॑त्यै प्र॒युजे॒ऽग्नये॒ स्वाहा॑ मे॒धायै॒ मन॑से॒ऽग्नये॒ स्वाहा॑ दी॒क्षायै॒ तप॑से॒ऽग्नये॒ स्वाहा॒ सर॑स्वत्यै पू॒ष्णेऽग्नये॒ स्वाहा॑। आपो॑ देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो॒ द्यावा॑पृथिवी॒ऽउरो॑ऽन्तरिक्ष। बृह॒स्पत॑ये ह॒विषा॑ विधेम॒ स्वाहा॑॥७॥

आकू॑त्या॒ इत्याऽकू॑त्यै। प्र॒युज॒ इति॑ प्र॒ऽयुजे॑। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। मे॒धायै॑। मन॑से। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। दी॒क्षायै॑। तप॑से। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। सर॑स्वत्यै। पू॒ष्णे। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। आपः॑। दे॒वीः॒। बृ॒ह॒तीः॒। वि॒श्व॒शं॒भु॒व॒ इति॑ विश्वऽशंभुवः। द्यावा॑पृथिवी॒ऽइति द्यावा॑पृथिवी। उरो॒ऽइत्युरो॑। अ॒न्त॒रि॒क्ष॒। बृह॒स्पत॑ये। ह॒विषा॑। वि॒धे॒म॒। स्वाहा॑ ॥७॥

Mantra without Swara
आकूत्यै प्रयुजे ग्नये स्वाहा मेधायै मनसे ग्नये स्वाहा दीक्षायै तपसेग्नये स्वाहा सरस्वत्यै पूष्णेग्नये स्वाहा । आपो देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो द्यावापृथिवी उरो अन्तरिक्ष । बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा ॥

आकूत्या इत्याऽकूत्यै। प्रयुज इति प्रऽयुजे। अग्नये। स्वाहा। मेधायै। मनसे। अग्नये। स्वाहा। दीक्षायै। तपसे। अग्नये। स्वाहा। सरस्वत्यै। पूष्णे। अग्नये। स्वाहा। आपः। देवीः। बृहतीः। विश्वशंभुव इति विश्वऽशंभुवः। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। उरोऽइत्युरो। अन्तरिक्ष। बृहस्पतये। हविषा। विधेम। स्वाहा॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में ‘यज्ञात्मक उत्तम इच्छा’ का वर्णन हुआ था। प्रस्तुत मन्त्र में उन्हीं उत्तम इच्छाओं के करनेवाले प्रगतिशील [ अग्नि ] जीव का वर्णन करते हुए कहते हैं कि— १. ( आकूत्यै ) = सङ्कल्पात्मा ( प्रयुजे ) = सङ्कल्पों को क्रियारूप में परिणित करनेवाले ( अग्नये ) =  प्रगतिशील जीव के लिए ( स्वाहा ) = [ सु+आह ] हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं। प्रशंसनीय जीवन उसी का है जिसका जीवन सङ्कल्पमय है। ‘यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः’ सब उत्तम कर्म सङ्कल्पों का ही परिणाम हैं, परन्तु उन सङ्कल्पों को क्रियारूप में परिणत करनेवाला ‘प्रयुक्’ ही प्रशस्त है। ‘सङ्कल्प करना और उसे क्रियान्वित करना’ ही प्रशंसनीय है। 

३. ( मेधायै ) = धारणावती बुद्धि के पुञ्जभूत [ embodiment ] ( मनसे ) = मननशील ( अग्नये ) = प्रगतिशील जीव के लिए ( स्वाहा ) = हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं। प्रशंसनीय वही है जो धारणावती बुद्धिवाला है और इस धारणावती बुद्धि के विकास के लिए मननशील बनता है। ‘मनन’ मेधा का जनक है। 

३. ( दीक्षायै ) = व्रत-संग्रह के लिए और ( तपसे ) = तप के लिए, दीक्षा और तप के द्वारा ( अग्नये ) = आगे बढ़नेवाले के लिए ( स्वाहा ) = प्रशंसा के शब्द कहे जाते हैं। जो व्यक्ति उन्नत होना चाहता है उसे दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए। व्रती जीवन ही जीवन है। व्रतपूर्ति के लिए तप की आवश्यकता है। तप की न्यूनता हमारे व्रतों के भङ्ग का कारण बनती है और व्रतभङ्ग का अभिप्राय है उन्नति का न होना। 

४. ( सरस्वत्यै ) = ज्ञान के अधिदेवता के लिए और साथ ही ( पूष्णे ) = पोषण के देवता के लिए और इस प्रकार ज्ञान और पोषण की देवताओं का आराधन करके ( अग्नये ) = आगे बढ़नेवाले के लिए ( स्वाहा ) = प्रशंसा के शब्द प्रस्तुत होते हैं। उत्तम जीवन वही है जिसमें ज्ञान और शरीर की दृढ़ता व शक्ति का समन्वय हुआ है। 

५. एवं, ( अग्नि ) = प्रगतिशील जीव में आठ बातें हैं जोकि दो-दो ग्रुप में होकर ऊपर चार वाक्यों में कही गई हैं। [ क ] सङ्कल्प तथा सङ्कल्प को क्रियान्वित करना, [ ख ] धारणावती बुद्धि का सम्पादन और उसके लिए मनन, [ ग ] व्रतग्रहण और व्रतपूर्ति के लिए तप [ घ ] विद्या व शक्ति का समन्वय। इन आठ बातों के होने पर ही व्यक्ति ‘अग्नि’ बन पाता है।

६. यह अग्नि [ जीव ] कहता है कि ( आपः ) = जल ( देवीः ) = दिव्य गुणोंवाले हैं ( बृहतीः ) =  हमारी वृद्धि के कारणभूत हैं ( विश्वशंभुवः ) = सब रोगों को शान्त करनेवाले हैं और इन जलों के अतिरिक्त ( द्यावापृथिवी ) = द्युलोक और पृथिवीलोक, ( उरो अन्तरिक्ष ) = विशाल अन्तरिक्षलोक के अधिष्ठाता ( बृहस्पतये ) = [ बृहतामाकाशदीनां पतिः ] बृहस्पति नाम से प्रसिद्ध प्रभु के लिए हम ( हविषा ) = हवि के द्वारा ( विधेम ) = पूजा करते हैं। ( स्वाहा ) = यह अत्यन्त सुन्दर वेदवाणी है। सब लोकों की पवित्रता के लिए अग्निहोत्रादि यज्ञों में विविध हविर्द्रव्यों का प्रक्षेप होता है। प्रभु की पूजा भी हवि से ही होती है—[ हु दानादनयोः ] ‘दानपूर्वक अदन’ यही प्रभु का आदेश है ‘त्यक्तेन भुज्जीथाः’, इस आदेश का पालन ही प्रभु-पूजन हो जाता है। यह औरों के हित के द्वारा प्रभु-पूजन करनेवाला ही सच्चा ‘प्रजापति’ है। यही प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है।
Essence
भावार्थ — उन्नति के लिए हम सङ्कल्पादि आठों साधनों की साधना करें। हवि द्वारा सब लोकों को पवित्र करें और प्रभु के प्रिय बनें।
Subject
उन्नति के अष्टस्तम्भ