Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 37

37 Mantra
4/37
Devata- यज्ञो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
या ते॒ धामा॑नि ह॒विषा॒ यज॑न्ति॒ ता ते॒ विश्वा॑ परि॒भूर॑स्तु य॒ज्ञम्। ग॒य॒स्फानः॑ प्र॒तर॑णः सु॒वीरोऽवी॑रहा॒ प्रच॑रा सोम॒ दुर्या॑न्॥३७॥

या। ते॒। धामा॑नि। ह॒विषा॑। यज॑न्ति। ता। ते॒। विश्वा॑। प॒रि॒भूरिति॑ परि॒ऽभूः। अ॒स्तु॒। य॒ज्ञम्। ग॒य॒स्फान॒ इति॑ गय॒ऽस्फानः॑। प्र॒तर॑ण॒ इति॑ प्र॒ऽतर॑णः। सु॒वीर॒ इति॑ सु॒ऽवीरः॑। अवी॑र॒हेत्यवी॑रऽहा। प्र। च॒र॒। सो॒म॒। दुर्य्या॑न् ॥३७॥

Mantra without Swara
या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम् । गयस्पानः प्रतरणः सुवीरो वीरहा प्रचरा सोम दुर्यान् ॥

या। ते। धामानि। हविषा। यजन्ति। ता। ते। विश्वा। परिभूरिति परिऽभूः। अस्तु। यज्ञम्। गयस्फान इति गयऽस्फानः। प्रतरण इति प्रऽतरणः। सुवीर इति सुऽवीरः। अवीरहेत्यवीरऽहा। प्र। चर। सोम। दुर्य्यान्॥३७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की भावना के अनुसार ‘ऋत का पालक’ प्रभु का ‘वत्स’ = प्रिय होता है। इस ऋत के पालन से ही यह अपनी सब इन्द्रियों को बड़ा प्रशस्त बना पाता है और ‘गोतम’ कहलाता है। प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘गोतम’ कहता है कि—हे प्रभो! ( ते ) = तेरी ( या ) = जिन ( धामानि ) = दीप्तियों [ Lustre ] व शक्तियों [ power ] को ( हविषा ) = दानपूर्वक अदन से ( यजन्ति ) = अपने साथ सङ्गत करते हैं [ यज् = सङ्गतीकरण ] ( ता ) = उन ( ते ) = तेरी ( विश्वा ) = सब दीप्तियों व शक्तियों को ( यज्ञम् ) = मेरे ये श्रेष्ठतम कर्म ( परिभूः अस्तु ) = व्याप्त करनेवाले हों, अर्थात् मैं यज्ञमय जीवन बिताता हुआ आपकी शक्तियों व दीप्तियों को प्राप्त करनेवाला बनूँ।

२. इन्हीं दीप्तियों व शक्तियों को प्राप्त करने के लिए यह ‘गाोतम’ सोम से प्रार्थना करता है कि—[ क ] हे ( सोम ) = वीर्यशक्ते! तू ( गयस्फानः ) = [ गयाः प्राणाः, स्फाय् वृद्वौ ] हमारी प्राणशक्ति की वृद्धि करनेवाली है। [ ख ] ( प्रतरणः ) = तेरे सुरक्षित होने पर हम सब रोगादि आपदाओं को तैरनेवाले होते हैं। [ ग ] ( सुवीरः ) = तेरा रक्षक उत्तम वीर बनता है। [ घ ] ( अवीरहा ) = हे सोम! तू वीरों को नष्ट न होने देनेवाला है। तू वीरों का परिपालक है। वीर तेरी रक्षा करते हैं तू वीरों की। 

३. हे सोम! तू ( दुर्यान् ) = हमारे घरों में ( प्रचर ) = प्रकर्षेण प्राप्त होनेवाला हो। हम सोमशक्ति-सम्पन्न हों। सोमशक्ति की रक्षा से हम प्राणशक्ति की वृद्धि करनेवाले, विघ्नों को तैरनेवाले व वीर बनेंगे। वीर बनकर हम ‘अवीरहा’ = यज्ञाङ्गिन को नष्ट न होने देनेवाले होंगे। [ वीरहा = यज्ञाङ्गिन को नष्ट करनेवाला ]। यज्ञशील बनकर हम यज्ञरूप प्रभु के सच्चे उपासक होंगे। उस समय उस प्रभु की दिव्यता का हममें भी अवतरण होगा और हम प्रभु की दीप्ति व शक्ति से चमकेंगे।
Essence
भावार्थ — हम यज्ञों से प्रभु के धाम को प्राप्त करें। यज्ञशील हम सोम की रक्षा करके बनेंगे।
Subject
यज्ञशीलता व सोम की रक्षा — दीप्ति व शक्ति