Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 34

37 Mantra
4/34
Devata- यजमानो देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्ची गायत्री,भूरिक् आर्ची बृहती,विराट् आर्ची अनुष्टुप् Swara- षड्जः, मध्यमः, गान्धारः
Mantra with Swara
भ॒द्रो मे॑ऽसि॒ प्रच्य॑वस्व भुवस्पते॒ विश्वा॑न्य॒भि धामा॑नि। मा त्वा॑ परिप॒रिणो॑ विद॒न् मा त्वा॑ परिप॒न्थिनो॑ विद॒न् मा त्वा॒ वृका॑ऽअघा॒यवो॑ विदन्। श्ये॒नो भू॒त्वा परा॑पत॒ यज॑मानस्य गृ॒हान् ग॑च्छ॒ तन्नौ॑ सँस्कृ॒तम्॥३४॥

भ॒द्रः। मे॒। अ॒सि॒। प्र। च्य॒व॒स्व॒। भु॒वः॒। प॒ते॒। वि॒श्वा॑नि। अ॒भि। धामा॑नि। मा। त्वा॒। प॒रि॒प॒रिण॒ इति॑ परिऽप॒रिणः॑। वि॒द॒न्। मा। त्वा॒। प॒रि॒प॒न्थिन॒ इति॑ परिऽप॒न्थिनः॑। वि॒द॒न्। मा। त्वा॒। वृकाः॑। अ॒घा॒यवः॑। अ॒घ॒यव॒ इत्य॑घ॒ऽयवः॑। वि॒द॒न्। श्ये॒नः। भू॒त्वा। परा॑। प॒त॒। यज॑मानस्य। गृ॒हान्। ग॒च्छ॒। तत्। नौ॒। सँ॒स्कृ॒तम् ॥३४॥

Mantra without Swara
भद्रो मेसि प्रच्यवस्व भुवस्पते विश्वान्यभि धामानि । मा त्वा परिपरिणो विदन्मा त्वा परिपन्थिनो विदन्मा वृका अघायवो विदन् । श्येनो भूत्वा परा पत यजमानस्य गृहान्गच्छ तन्नौ सँस्कृतम् ॥

भद्रः। मे। असि। प्र। च्यवस्व। भुवः। पते। विश्वानि। अभि। धामानि। मा। त्वा। परिपरिण इति परिऽपरिणः। विदन्। मा। त्वा। परिपन्थिन इति परिऽपन्थिनः। विदन्। मा। त्वा। वृकाः। अघायवः। अघयव इत्यघऽयवः। विदन्। श्येनः। भूत्वा। परा। पत। यजमानस्य। गृहान्। गच्छ। तत्। नौ। सँँस्कृतम्॥३४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पति-पत्नी अलग-अलग प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि— १. ( भद्रः मे असि ) = मेरे लिए आप कल्याण व सुख को देनेवाले हैं। इहलौकिक दृष्टिकोण से आप मेरे जीवन को सुखी बनाते हैं तो पारलौकिक दृष्टिकोण से आप ही मेरा कल्याण करते हैं। 

२. हे ( भुवस्पते ) = हे सब भुवनों व भूतों के रक्षक अथवा ज्ञान के स्वामिन् प्रभो! ( विश्वानि धामानि ) = सब तेजों को ( मा अभि प्रच्यवस्व ) = मेरे प्रति प्राप्त कराइए [ धाम Light, lustre, power, strength ]। आपकी कृपा से मैं ज्ञान की दीप्तियों को प्राप्त करूँ तथा शक्तिशाली बनूँ। 

३. हे प्रभो ! ( त्वा ) = आपको [ क ] ( परिपरिणः ) = इधर-उधर घूमकर लूटनेवाले लोग [ सर्वतः सञ्चरन्तस्तस्कर- विशेषाः ]। ( मा विदन् ) = मत प्राप्त करें और इसी प्रकार [ ख ] ( परिपन्थिनः ) = [ यागादीनां प्रतिषेधकाः शत्रवः ] यागादि उत्तम कर्मों में विघ्न डालनेवाले लोग ( त्वा ) = आपको ( मा विदन् ) = मत प्राप्त हों। [ ग ] ( वृकाः ) = [ वृक आदाने ] लेने ही लेनेवाले, जिन्होंने देना सीखा ही नहीं, ऐसे लोभी लोग तथा [ घ ] ( अघायवः ) = [ परस्याघं कर्तुमिच्छन्ति ] दूसरे का सदा बुरा करने की कामनावाले लोग ( त्वा ) = आपको ( मा विदन् ) = मत प्राप्त हों। दूसरे शब्दों में मैं ‘परिपरी-परिपन्थी-वृक व अघायु’ न बनूँ। इन सब वृत्तियों से ऊपर उठकर मैं आपको पानेवाला बनूँ। 

४. हे प्रभो! आप तो ( श्येनो भूत्वा ) = श्येनवत् शीघ्रगामी होकर ( परापत ) = सुदूर स्थान से भी मुझे प्राप्त होओ। मैं आपसे कितना भी दूर होऊँ, अब तो मेरी यही कामना है कि मैं शीघ्र-से-शीघ्र आपको प्राप्त करनेवाला बनूँ। वस्तुतः मैं स्वयं ( श्येन ) = क्रियाशील बनूँगा तभी आपको प्राप्त कर पाऊँगा। 

५. हे प्रभो! ( यजमानस्य गृहान् गच्छ ) = मुझ यज्ञशील के घर को प्राप्त होओ। ‘मैं गतिशील बना हूँ—मेरी गति यज्ञों में परिणत हुई है।’ इस यजुर्वेद के प्रारम्भ में आपने यही प्रेरणा दी थी कि तुम गतिशील हो और सदा उत्तम कर्मों में प्रेरित होते रहो। ( तत् ) = वह ( नौ ) = हमारा घर ( संस्कृतम् ) = संस्कृत हुआ है, शुद्ध बनाया गया है। हमने इसे इसीलिए तो पवित्र बनाने का प्रयत्न किया है कि हम आपको प्राप्त कर सकें। इस घर में हम आपका आतिथ्य कर पाएँ।
Essence
भावार्थ — हम प्रभु से सब ज्ञानदीप्तियों व शक्तियों को प्राप्त करके ‘परिपरी-परिपन्थी- वृक व अधायु’ बनने से बचें। क्रियाशील व यजमान बनकर प्रभु के स्वागत के लिए अपने घर को संस्कृत कर लें।
Subject
संस्कृत-घर