Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 33

37 Mantra
4/33
Devata- सूर्य्यविद्वांसौ देवते Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी गायत्री,याजुषी जगती Swara- षड्जः, निषादः
Mantra with Swara
उस्रा॒वेतं॑ धूर्षाहौ यु॒ज्येथा॑मन॒श्रूऽअवी॑रहणौ ब्रह्म॒चोद॑नौ। स्व॒स्ति यज॑मानस्य गृ॒हान् ग॑च्छतम्॥३३॥

उस्रौ॑। आ। इ॒त॒म्। धू॒र्षा॒हौ॒। धूः॒स॒हा॒विति॑ धूःऽसहौ। यु॒ज्येथा॑म्। अ॒न॒श्रूऽइत्य॑न॒श्रू। अवी॑रहणौ। अवी॑रहनावित्यवी॑रऽहनौ। ब्र॒ह्म॒चोद॑ना॒विति॑ ब्रह्म॒ऽचोद॑नौ। स्व॒स्ति। यज॑मानस्य। गृ॒हान्। ग॒च्छ॒त॒म् ॥३३॥

Mantra without Swara
उस्रावेतन्धूर्षाहौ युज्येथामनश्रू अवीरहणौ ब्रह्मचोदनौ । स्वस्ति यजमानस्य गृहान्गच्छतम् ॥

उस्रौ। आ। इतम्। धूर्षाहौ। धूःसहाविति धूःऽसहौ। युज्येथाम्। अनश्रूऽइत्यनश्रू। अवीरहणौ। अवीरहनावित्यवीरऽहनौ। ब्रह्मचोदनाविति ब्रह्मऽचोदनौ। स्वस्ति। यजमानस्य। गृहान्। गच्छतम्॥३३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु की उपासना करनेवाले पति-पत्नी कैसे बनते हैं—

१. ( उस्रौ ) = [ उस्रा = रश्मि—नि० १।५ ] ये ज्ञान की रश्मियोंवाले होते हैं। नैत्यिक स्वाध्याय के कारण इनकी ज्ञानाङ्गिन सदा प्रकाशित रहती है। 

२. ( धूर्षाहौ ) = [ धुरं सहेते ] गृहस्थ के बोझ को उठाने में ये सदा समर्थ होते हैं। प्रभु की उपासना इन्हें शक्ति देती है और ये गृहस्थ के कार्यभार का सुन्दरता से वहन करते हुए घर को स्वर्ग बनाने का यत्न करते हैं। 

३. ( अनश्रू ) = [ अश्रुरहितौ सोत्साहौ ] ये संसार-यात्रा में आनेवाले विघ्नों से घबरा नहीं जाते। कितने भी विघ्न आएँ ये रोने-धोने नहीं लगते, अपितु अपने उत्साह को स्थिर रखते हुए ये आगे और आगे बढ़ते हैं। भाग्य का रोना रोने नहीं बैठ जाते। 

४. ( अवीरहणौ ) = अपने घर में वे यज्ञाङ्गिन को कभी बुझने नहीं देते। यज्ञाङ्गिन को बुझने देनेवाला ‘वीरहा’ है। ये दोनों अवीरहा बनते हैं। 

५. ( ब्रह्मचोदनौ ) [ ब्रह्म = वेद ] = ये वेद से प्रेरणा लेनेवाले बनते हैं। श्रुति को परम प्रमाण मानते हुए ये अपनी जीवन-यात्रा के लिए वहीं से प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

६. ऐसे तुम दोनों ( एतम् ) = इस गृहस्थ-शकट में ( युज्येथाम् ) = जुत जाओ। इन गुणों से युक्त पति-पत्नी गृहस्थ में प्रवेश करेंगे तो ( स्वस्ति ) = उनका कल्याण अवश्य होगा ही। ( यजमानस्य ) =  यज्ञशील के ( गृहान् गच्छतम् ) = घर को तुम प्राप्त होओ, अर्थात् तुम्हारा घर ऐसा बने जहाँ यज्ञ करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वाभाविक बन गया हो। यज्ञ के बिना उस घर के लोग रह ही न सकते हों।
Essence
भावार्थ — पति-पत्नी ज्ञानरश्मियोंवाले, कार्यभार को उठाने में सक्षम, न रोनेवाले, यज्ञाङ्गिन को न बुझने दनेवाले तथा श्रुति से प्रेरणा प्राप्त करनेवाले हों। उनका घर ‘यजमान =  यज्ञशील’ का घर हो।
Subject
यजमान का घर