Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 32

37 Mantra
4/32
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सूर्य॑स्य॒ चक्षु॒रारो॑हा॒ग्नेर॒क्ष्णः क॒नीन॑कम्। यत्रैत॑शेभि॒रीय॑से॒ भ्राज॑मानो विप॒श्चिता॑॥३२॥

सूर्य्य॑स्य। चक्षुः॑। आ। रो॒ह॒। अ॒ग्नेः। अ॒क्ष्णः। क॒नीन॑कम्। यत्र॑। एत॑शेभिः। ईय॑से। भ्राज॑मानः। वि॒प॒श्चितेति॑ विपः॒ऽचिता॑ ॥३२॥

Mantra without Swara
सूर्यस्य चक्षुरारोहाग्नेरक्ष्णः कनीनकम् । यत्रैत्रशेभिरीयसे भ्राजमानो विपश्चिता ॥

सूर्य्यस्य। चक्षुः। आ। रोह। अग्नेः। अक्ष्णः। कनीनकम्। यत्र। एतशेभिः। ईयसे। भ्राजमानः। विपश्चितेति विपःऽचिता॥३२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु सूर्यादि सब देवों के प्रकाशक हैं। ( सूर्यस्य ) = सूर्य के ( चक्षुः ) = प्रकाशक प्रभु को, ( अग्नेः ) [ चक्षुः ] = इस पृथिवीस्थ देव अग्नि के भी प्रकाशक उस प्रभु को तथा जो ( अक्ष्णः ) = आँख की ( कनीनकम् ) = पुतली के स्थानापन्न हैं, उस प्रभु को ( आरोह ) = तू प्राप्त हो। जैसे योगारुढ़ बनने का अभिप्राय है योगमार्ग को प्राप्त करना, इसी प्रकार प्रभु को आरुढ़ होने का अभिप्राय है कि तू प्रभु को प्राप्त हो। मानव-जीवन का यही लक्ष्य है कि हम इस प्राकृतिक संसार में प्रभु की महिमा को देखते हुए प्रभु तक पहुँचने का प्रयत्न करें। वे प्रभु ही सूर्य को प्रकाश दे रहे हैं—अग्नि में उन्होंने ही दाहक शक्ति को रक्खा है और आँख को भी रोशनी देनेवाले वे प्रभु ही हैं। इस प्रकार प्रत्येक प्रकाशमय पदार्थ में प्रभु की महिमा का दर्शन होता है।

पिछले मन्त्र में ‘हृदय में कर्मसङ्कल्प के धारण’ का उल्लेख था। हमारे हृदयों में प्रभु-प्राप्ति का सङ्कल्प हो। प्रस्तुत मन्त्र में प्रार्थना करते हैं कि हमारा हृदय वह है ( यत्र ) =  जहाँ ( भ्राजमानः ) = देदीप्यमान वे प्रभु विराजते हैं और ( विपश्चिता ) = [ वि पश् चित् ] इन सूर्यादि पिण्डों को सूक्ष्मता से देखकर चिन्तन करनेवाले पुरुष से ( एतशेभिः ) = इन इन्द्रियरूप घोड़ों के द्वारा ( ईयसे ) = आप प्राप्त किये जाते हो। हम अपने हृदयों में प्रभु का दर्शन करें। यह दर्शन तभी होगा जब हम सूर्यादि पिण्डों में उस प्रभु की महिमा को देखनेवाले बनेंगे। इस सृष्टि-रचना को सूक्ष्मता से देखकर चिन्तन करनेवाला पुरुष हृदयस्थ प्रभु का अवश्य दर्शन करता है। वे प्रभु भ्राजमान हैं, उनकी भ्राजमानता ही इन सूर्यादि देवों को भी भ्राजमान कर रही है। ‘तेन देवा देवतामग्र आयन्’ उस प्रभु से ही ये सब देव देवत्व को प्राप्त होते हैं। मैं भी प्रभु के सम्पर्क में आकर देव बनूँगा।
Essence
भावार्थ — वे प्रभु सूर्यादि देवों के प्रकाशक हैं। सूक्ष्म दृष्टिवाला पुरुष प्रत्येक पिण्ड में प्रभु का दर्शन करता  है।
Subject
सूर्यादि के प्रकाशक