Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 29

37 Mantra
4/29
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्रति॒ पन्था॑मपद्महि स्वस्ति॒गाम॑ने॒हस॑म्। येन॒ विश्वाः॒ परि॒ द्विषो॑ वृ॒णक्ति॑ वि॒न्दते॒ व॒सु॑॥२९॥

प्रति॑। पन्था॑म्। अ॒प॒द्म॒हि॒। स्व॒स्ति॒गामिति॑ स्वस्ति॒ऽगाम्। अ॒ने॒हस॑म्। येन॑। विश्वाः॑। परि॑। द्विषः॑। वृ॒णक्ति॑। वि॒न्दते॑। वसु॑ ॥२९॥

Mantra without Swara
प्रति पन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेहसम् येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु ॥

प्रति। पन्थाम्। अपद्महि। स्वस्तिगामिति स्वस्तिऽगाम्। अनेहसम्। येन। विश्वाः। परि। द्विषः। वृणक्ति। विन्दते। वसु॥२९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र की प्रार्थना थी कि हम ‘दुराचार से दूर और सदाचार के समीप हों’। वही प्रार्थना शब्द परिवर्तन के साथ पुनः की जाती है कि ( पन्थाम् ) = सन्मार्ग को ( प्रति अपद्महि ) = प्राप्त हों। सदा मार्ग पर ही चलें, मार्ग से कभी भटकें नहीं। स्तुति-निन्दा, लाभ-हानि व जीवन-मरण भी हमें मार्ग से भटकानेवाले न हों। 

२. हम उस मार्ग को प्राप्त हों जो ( स्वस्तिगाम् ) = कल्याण की ओर ले-जानेवाला है, हमारे जीवन की स्थिति को उत्तम करनेवाला है [ सु+अस्ति ] और ( अनेहसम् ) = एहस् ‘पाप’ से शून्य है। वस्तुतः कल्याण का मार्ग वही है जो पापशून्य है। दूसरा मार्ग तो थोड़ी-सी देर के लिए चमककर फिर अन्धकारमय हो जानेवाला है। 

३. पापशून्य मार्ग वह है ( येन ) = जिससे जीव ( विश्वाः ) = सब ( द्विषः ) = द्वेष की भावनाओं को [ द्वेषणं द्विट् ] ( परिवृणक्ति ) = छोड़ देता है और ( वसु ) = निवास के लिए उत्तम धनों को ( विन्दते ) = प्राप्त करता है। द्वेष से शरीर में कुछ ऐसे विष पैदा हो जाते हैं जिनसे दीर्घ जीवन की प्राप्ति सम्भव नहीं रहती। द्वेष मन को सदा मलिन किये रहता है, उससे मन में प्रसाद व उल्लास का अभाव हो जाता है जो आयुष्य के लिए बड़ा घातक होता है।
Essence
भावार्थ — हम निर्द्वेषता व प्रेम के कल्याणकर, पापशून्य मार्ग पर चलनेवाले बनें।
Subject
रास्ता = द्वेष - त्याग