Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 25

37 Mantra
4/25
Devata- सविता देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- भूरिक् शक्वरी,भूरिक् गायत्री, Swara- निषादः, षड्जः
Mantra with Swara
अ॒भि त्यं दे॒वꣳ स॑वि॒तार॑मो॒ण्योः क॒विक्र॑तु॒मर्चा॑मि स॒त्यस॑वꣳ रत्न॒धाम॒भि प्रि॒यं म॒तिं क॒विम्। ऊ॒र्ध्वा यस्या॒मति॒र्भाऽअदि॑द्यु॒त॒त् सवी॑मनि॒ हिर॑ण्यपाणिरमिमीत सु॒क्रतुः॑ कृ॒पा स्वः॑। प्र॒जाभ्य॑स्त्वा प्र॒जास्त्वा॑ऽनु॒प्राण॑न्तु प्र॒जास्त्वम॑नु॒प्राणि॑हि॥२५॥

अ॒भि। त्यम्। दे॒वम्। स॒वि॒ता॑रम्। ओण्योः᳖। क॒विक्र॑तु॒मिति॑ क॒विऽक्र॑तु॒म्। अर्चा॑मि। स॒त्यस॑व॒मिति॑ स॒त्यऽस॑वम्। र॒त्न॒ऽधामिति॑ रत्न॒धाम्। अ॒भि। प्रि॒यम्। म॒तिम्। क॒विम्। ऊ॒र्ध्वा। यस्य॑। अ॒मतिः॑। भाः। अदि॑द्यु॒तत्। सवी॑मनि। हिर॑ण्यपाणि॒रिति॒ हिर॑ण्यऽपाणिः। अ॒मि॒मी॒त॒। सु॒क्रतु॒रिति॑ सु॒ऽक्रतुः॑। कृ॒पा। स्व॒रिति॒ स्वः॑। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒ऽजाभ्यः॑। त्वा॒। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। त्वा॒। अ॒नु॒प्राण॒न्त्वित्य॑नु॒ऽप्राण॑न्तु॒। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। त्वम्। अ॒नु॒ऽप्राणि॒हीत्य॑नु॒ऽप्राणि॑हि ॥२५॥

Mantra without Swara
अभि त्यं देवँ सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसवँ रत्नधामभि प्रियम्मतिङ्कविम् । ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा अदिद्युतत्सवीमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः । प्रजाभ्यस्त्वा । प्रजास्त्वानुप्राणन्तु प्रजास्त्वमनुप्राणिहि ॥

अभि। त्यम्। देवम्। सवितारम्। ओण्योः। कविक्रतुमिति कविऽक्रतुम्। अर्चामि। सत्यसवमिति सत्यऽसवम्। रत्नऽधामिति रत्नधाम्। अभि। प्रियम्। मतिम्। कविम्। ऊर्ध्वा। यस्य। अमतिः। भाः। अदिद्युतत्। सवीमनि। हिरण्यपाणिरिति हिरण्यऽपाणिः। अमिमीत। सुक्रतुरिति सुऽक्रतुः। कृपा। स्वरिति स्वः। प्रजाभ्य इति प्रऽजाभ्यः। त्वा। प्रजा इति प्रऽजाः। त्वा। अनुप्राणन्त्वित्यनुऽप्राणन्तु। प्रजा इति प्रऽजाः। त्वम्। अनुऽप्राणिहीत्यनुऽप्राणिहि॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में ज्ञानपुष्पों के चयन का उल्लेख था। उन ज्ञानपुष्पों का चयन करके प्रस्तुत मन्त्र में उन पुष्पों द्वारा प्रभु के अर्चन का उल्लेख करते हैं। इन ज्ञानपुष्पों का अवचयन करके मैं ( त्यम् ) = उस ( देवम् ) = ज्ञान की दीप्तिवाले ( सवितारम् ) = सबके प्रेरक परमात्मा की ( अभि ) = ओर जाता हूँ और ( ओण्योः ) = द्यावापृथिवी के इस [ ओणृ अपनयने, द्यौष्पिता पृथिवी माता, ये द्युलोकरूपी माता-पिता हमारे कष्टों का अपनयन करते हैं ] ( कविक्रतुम् ) = ज्ञानी निर्माता [ creator ] को ( अर्चामि ) = पूजता हूँ। वे प्रभु इस संसार का निर्माण करनेवाले हैं और इसके निर्माण में एक-एक पिण्ड में प्रभु की प्रज्ञा का प्रकाश हो रहा है। प्रत्येक पदार्थ की रचना अपने में पूर्ण है ‘पूर्णमदः, पूर्णमिदम्’। इस संसार का निर्माण प्रभु की सर्वज्ञता का प्रमाण है। 

२. मैं उस प्रभु की अर्चना करता हूँ जोकि ( सत्यसवम् ) = सदा सत्य की प्रेरणा देनेवाले हैं। ( रत्नधाम् ) = हममें उत्तमोत्तम रत्नों = रमणीय रुधिर आदि धातुओं का धारण करनेवाले हैं, ( अभिप्रियम् ) = सबके प्रति प्रेमवाले हैं। ( मतिम् ) = सर्वज्ञ हैं ( कविम् ) = क्रान्तदर्शी हैं व सृष्टि-आरम्भ में सब विद्याओं का ज्ञान देनेवाले हैं [ कौति सर्वा विद्याः ] 

३. ( यस्य ) = जिस प्रभु की ( अमतिः ) = न मापने योग्य [ Immeasureable ] ( भा ) = दीप्ति ( ऊर्ध्वा ) = सर्वोत्कृष्ट होती हुई ( अदिद्युतत् ) = दीप्त हो रही है। संसार में एक-से-एक बढ़कर ज्ञानी विद्यमान हैं, यह ज्ञान का तारतम्य प्रभु में आकर विश्रान्त हो जाता है, उनसे अधिक ज्ञान का सम्भव ही नहीं, अतः वह ऊर्ध्वा = सर्वोत्कृष्ट ज्ञानदीप्ति सर्वत्र द्योतित हो रही है।

४. ( सवीमनि ) = इस उत्पन्न जगत् में ( हिरण्यपाणिः ) = [ हिरण्यं वीर्यम् ] शक्तिशाली हाथोंवाला वह ( सुक्रतुः ) = सर्वोत्तम कर्त्ता [ creator ] ( कृपा ) = अपने सामर्थ्य से अथवा प्राणिमात्र पर दया से ( स्व  ) = इस देदीप्यमान सूर्य का ( अमिमीत ) = निर्माण करता है। ‘प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः’ = यह सूर्य प्रजाओं का प्राण ही तो है। 

५. प्रभु इस सूर्य से कहते हैं कि ( प्रजाभ्यः त्वा ) = इन प्रजाओं के हित के लिए मैंने तुझे बनाया है। ( प्रजाः ) = सब प्रजाएँ ( त्वा अनुप्राणन्तु ) = तेरी अनुकूलता में प्राणशक्ति को धारण करें। ( त्वम् ) = तू ( प्रजाः अनुप्राणिहि ) = प्रजाओं को प्राणशक्ति से सञ्चरित कर दे। तू उनमें प्राणशक्ति फूँक दे। संसार में यह सूर्य प्रभु की अद्भुत रचना है। ३३ देवों का यही मुखिया है। इसकी रचना का अध्ययन हमें प्रभु की विभूति का दर्शन कराता है। हम इस विभूति-दर्शन से प्रभु का दर्शन करने में समर्थ होते हैं और प्रभु के प्रिय बन पाते हैं—‘वत्स’ हो जाते हैं।
Essence
भावार्थ — हम ज्ञान-प्राप्ति द्वारा प्रभु की उपासना करें।
Subject
ज्ञानपुष्पों से प्रभु का अर्चन