Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 24

37 Mantra
4/24
Devata- यज्ञो देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- ब्राह्मी जगती,याजुषी पङ्क्ति, Swara- निषादः, पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒ष ते॑ गाय॒त्रो भा॒गऽइति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूतादे॒ष ते॒ त्रैष्टु॑भो भा॒गऽइति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूतादे॒ष ते॒ जाग॑तो भा॒गऽइति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूताच्छन्दोना॒माना॒ सा॑म्राज्यङ्ग॒च्छेति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूतादास्मा॒कोऽसि शु॒क्रस्ते॒ ग्रह्यो॑ वि॒चित॑स्त्वा॒ विचि॑न्वन्तु॥२४॥

ए॒षः। ते॒। गा॒य॒त्रः। भा॒गः। इति॑। मे॒। सोमा॑य। ब्रू॒ता॒त्। ए॒षः। ते॒। त्रैष्टु॑भः। त्रैस्तु॑भ॒ इति त्रैऽस्तु॑भः। भा॒गः। इति॑। मे॒। सोमा॑य। ब्रू॒ता॒त्। ए॒षः। ते॒। जाग॑तः। भा॒गः। इति॑। मे॒। सोमा॑य। ब्रू॒ता॒त्। छ॒न्दो॒ना॒माना॒मिति॑ छन्दःऽना॒माना॑म्। साम्रा॑ज्य॒मिति॒ साम्ऽरा॑ज्यम्। ग॒च्छ॒। इति॑। मे॒। सोमा॑य। ब्रू॒ता॒त्। आ॒स्मा॒कः। अ॒सि॒। शु॒क्रः। ते॒। ग्रह्यः॑। वि॒चित॒ इति॑ वि॒ऽचितः॑। त्वा॒। वि। चि॒न्व॒न्तु॒ ॥२४॥

Mantra without Swara
एष ते गायत्रो भाग इति मे सोमाय ब्रूतादेष ते त्रैष्टुभो भाग इति मे सोमाय ब्रूतादेष ते जागतो भाग इति मे सोमाय ब्रूताच्छन्दोनामानाँ साम्राज्यङ्गच्छेति मे सोमाय ब्रूतादास्माकोसि शुक्रस्ते ग्रह्यो विचितस्त्वा विचिन्वन्तु ॥

एषः। ते। गायत्रः। भागः। इति। मे। सोमाय। ब्रूतात्। एषः। ते। त्रैष्टुभः। त्रैस्तुभ इति त्रैऽस्तुभः। भागः। इति। मे। सोमाय। ब्रूतात। एषः। ते। जागतः। भागः। इति। मे। सोमाय। ब्रूतात्। छन्दोनामानामिति छन्दःऽनामानाम्। साम्राज्यमिति साम्ऽराज्यम्। गच्छ। इति। मे। सोमाय। बूतात्। आस्माकः। असि। शुक्रः। ते। ग्रह्यः। विचित इति विऽचितः। त्वा। वि। चिन्वन्तु॥२४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. विद्यार्थी आचार्य से कहता है कि ( एषः ) = यह ( ते ) = आपका ( गायत्रः ) = गायत्रीछन्द-सम्बन्धी ( भागः ) = सेवन है। आपने गायत्रीछन्द के मन्त्रों का खूब अध्ययन किया है, उन्हें अपने जीवन का भाग [ part and parcel ] बनाया है, ( इति ) = इस कारण ( मे ) = मुझ ( सोमाय ) = सौम्य स्वभाववाले के लिए ( ब्रूतात् ) = इसका उपेदश कीजिए। 

२. ( एषः ) = यह ( ते ) = आपका ( त्रैष्टुभः ) = त्रिष्टुप् छन्द-सम्बन्धी ( भागः ) = सेवन है। आपने त्रिष्टुप्छन्द के मन्त्रों द्वारा ‘प्रकृति, जीव व परमात्मा’ तीनों का स्तवन किया है, अर्थात् तीनों का ही ज्ञान प्राप्त किया है। अथवा इन तीनों का ज्ञान प्राप्त करके ‘आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक’ तीनों ही कष्टों को समाप्त किया है अथवा ‘काम-क्रोध-लोभ’ इन तीनों शत्रुओं को अन्दर घुसने से रोका है [ त्रि-स्तुप् to stop ]। एवं, ये मन्त्र आपके जीवन का भाग बन गये हैं, ( इति ) = इस कारण ( मे सोमाय ) = मुझ सौम्य स्वभाववाले के लिए ( ब्रूतात् ) = आप इनका उपदेश कीजिए। 

३. हे प्रभो! ( एषः ) = यह ( ते ) = तेरा ( जागतः ) = जगतीछन्द-सम्बन्धी मन्त्रों का ( भागः ) = सेवन है। आपने जगती छन्द के मन्त्रों का अध्ययन करके उन्हें अपने जीवन का भाग बना लिया है और परिणामतः आप सर्वभूतहित में रत हुए हैं, ( इति ) = इस कारण ( मे सोमाय ) = मुझ सौम्य के लिए ( ब्रूतात् ) = इनका उपदेश कीजिए।

४. आप ( छन्दोनामानाम् ) = उष्णिक् आदि छन्द नामवाले मन्त्रों के ( साम्राज्यं गच्छ ) = साम्राज्य को प्राप्त हुए हैं [ अगच्छाः = गच्छ ] अर्थात् उनके अधिपति बने हैं, ( इति ) = अतः ( मे सोमाय ) = मुझ सौम्य स्वभाववाले के लिए ( ब्रूतात् ) = उनका उपदेश कीजिए। 

५. ( आस्माकः असि ) = [ अस्माकमयत् इति ] आप हमारे उपदेष्टा हैं। आप हमारा हित चाहनेवाले हैं। 

६. ( शुक्रः ) = आप [ शुच् दीप्तौ ] दीप्त ज्ञानवाले हैं [ शुचि पवित्र ] पवित्र मनवाले हैं [ शुक् गतौ ] निरन्तर क्रियाशील [ ब्रह्मज्ञानी ] हैं [ क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ] 

७. ( ते ) = आपकी यह वेदवाणी ( ग्रह्यः ) = हमारे ग्रहण के योग्य है। अथवा आपका यह वेदज्ञान औरों से ग्रहण के योग्य है। आप इस वेदज्ञान को देने के लिए सदैव उद्यत हैं। 

८. ( विचितः ) = विशेष रूप से या ( वि ) = एक- एक करके इन ज्ञानपुष्पों का चयन करनेवाले ब्रह्मचारी ( त्वा विचिन्वन्तु ) = आपसे इन ज्ञानपुष्पों का चयन करें। [ चि धातु, द्विकर्मक है ‘वृक्षम् अवचिनोति फलानि ] जैसे एक पुजारी बाग में आकर वृक्षों से फूलों का अवचयन करता है इसी प्रकार एक सौम्य शिष्य आचार्यरूप वृक्ष से ज्ञानरूप पुष्पों का चयन करता है। यही विद्यार्थी आचार्य का ‘वत्स’ = प्रिय होता है।
Essence
भावार्थ — आचार्य ज्ञानी हो, विद्यार्थी का भला चाहे। विद्यार्थी सौम्य हो, उसमें ज्ञान-प्राप्ति की प्रबल कामना हो। ज्ञानपुष्पों का चयन ही उसका ध्येय हो।
Subject
ज्ञान-पुष्प विचयन