Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 23

37 Mantra
4/23
Devata- वाग्विद्युतौ देवते Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- आस्तार पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सम॑ख्ये दे॒व्या धि॒या सं दक्षि॑णयो॒रुच॑क्ष॒सा। मा म॒ऽआयुः॒ प्रमो॑षी॒र्मोऽअ॒हं तव॑ वी॒रं वि॑देय॒ तव॑ देवि स॒न्दृशि॑॥२३॥

सम्। अ॒ख्ये॒। दे॒व्या। धि॒या। सम्। दक्षि॑णया। उ॒रुच॑क्ष॒सेत्यु॒रुऽच॑क्षसा। मा। मे॒। आयुः॑। प्र। मो॒षीः॒। मोऽइति॒ मो। अ॒हम्। तव॑। वी॒रम्। वि॒दे॒य॒। तव॑। देवि॒। संदृशीति॑ स॒म्ऽदृशि॑ ॥२३॥

Mantra without Swara
समख्ये देव्या धिया सन्दक्षिणयोरुचक्षसा मा म आयुः प्र मोषीर्मा अहन्तव वीरँविदेय तव देवि सन्दृशि ॥

सम्। अख्ये। देव्या। धिया। सम्। दक्षिणया। उरुचक्षसेत्युरुऽचक्षसा। मा। मे। आयुः। प्र। मोषीः। मोऽइति मो। अहम्। तव। वीरम्। विदेय। तव। देवि। संदृशीति सम्ऽदृशि॥२३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में आचार्य से वेदवाणी के पढ़ने का उल्लेख था। वेदवाणी का पढ़नेवाला यह ‘वत्स’ कहता है कि मैं ( सम् अख्ये ) = [ सं चक्ष् ] इस वेदवाणी का दर्शन करता हूँ, [ क ]( देव्या धिया ) = प्रकाशमय बुद्धि के दृष्टिकोण से। मैं इसलिए वेदवाणी को पढ़ता हूँ कि मेरी बुद्धि प्रकाशमय हो, मेरा ज्ञान उज्ज्वल हो। [ ख ] ( सम् ) [ अख्ये ] = मैं इस वेदवाणी का दर्शन करता हूँ, ( दक्षिणया ) [ धिया ] = दक्षिण क्रिया के हेतु से [ धी = कर्म ] इसलिए वेदवाणी को पढ़ता हूँ कि मेरे कर्म कुशलता से, दक्षिणता से किये जाएँ। कुशलता से किये जाकर वे कर्म मेरे लिए बन्धनशील न हों। [ ग ] ( उरुचक्षसा ) [ धिया ] = विशाल दृष्टि के ध्यान से [ धी = ध्यान ]। मैं वेदवाणी का अध्ययन इसलिए करता हूँ कि मेरा प्रत्येक कर्म विशाल दृष्टिकोण से प्रेरित होकर हो, मैं केवल अपना हित देखकर कर्म करनेवाला न बन जाऊँ। संक्षेप में यह कह सकते हैं कि यह वेदवाणी हमारी बुद्धि को उज्ज्वल बनाती है, हमें कुशलता से कार्य करनेवाला करती है और हमारे दृष्टिकोण को विशाल बनाती है। 

२. वत्स इस वेदवाणी से प्रार्थना करता है कि ( मे ) = मेरे ( आयुः ) = जीवन को ( मा ) = मत ( प्रमोषीः ) = चुराना, लुप्त करना। वेदवाणी के द्वारा मैं सुन्दर दीर्घजीवन को प्राप्त करूँ।( मा उ ) = और न ही ( अहम् ) = मैं ( तव ) = तेरा प्रमोषण करूँ, अर्थात् मेरे जीवन में वेदवाणी का सतत अध्ययन होता ही रहे। हे ( देवि ) = मेरे जीवन को प्रकाशमय करनेवाली वाणि! मैं ( तव सन्दृशि ) = तेरे सन्दर्शन में ही अपने सम्पूर्ण जीवन का यापन करूँ। कभी तेरी आँख से ओझल न होऊँ। तेरी प्रेरणा के अनुसार ही मेरे सारे कार्य हों। मैं इस ( वीरं विदेय ) = शत्रुओं के कम्पित करनेवाले ज्ञान को प्राप्त करूँ।
Essence
भावार्थ — वेदवाणी के अध्ययन से हमारी प्रज्ञा [ धी ] उज्ज्वल हो, हमारे कर्म कुशलता से किये जाएँ और कर्मों के करते समय हमारा दृष्टिकोण विशाल हो।
Subject
वेदवाणी के सन्दर्शन में