Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 22

37 Mantra
4/22
Devata- वाग्विद्युतौ देवते Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- ब्राह्मी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अदि॑त्यास्त्वा मू॒र्द्धन्नाजि॑घर्मि देव॒यज॑ने पृथि॒व्याऽइडा॑यास्प॒दम॑सि घृ॒तव॒त् स्वाहा॑। अ॒स्मे र॑मस्वा॒स्मे ते॒ बन्धु॒स्त्वे रायो॒ मे रायो॒ मा व॒यꣳ रा॒यस्पोषे॑ण॒ वियौ॑ष्म॒ तातो॒ रायः॑॥२२॥

अदि॑त्याः। त्वा॒। मू॒र्द्धन्। आ। जि॒घर्मि॒। दे॒व॒यज॑न॒ इति॑ देव॒ऽयज॑ने। पृ॒थि॒व्याः। इडा॑याः। प॒दम्। अ॒सि॒। घृ॒तव॒दि॑ति घृ॒तऽव॑त्। स्वाहा॑। अ॒स्मे॑ऽइत्य॒स्मे। र॒म॒स्व॒। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। ते॒। बन्धुः॑। त्वेऽइति॒ त्वे। रायः॑। मेऽइति॒ मे। रायः॑। मा। व॒यम्। रा॒यः। पोषे॑ण। वि। यौ॒ष्म॒। तोतः॑। रायः॑ ॥२२॥

Mantra without Swara
अदित्यास्त्वा मूर्धन्ना जिघर्मि देवयजने पृथिव्या इडायास्पदमसि घृतवत्स्वाहा । अस्मे रमस्वास्मे ते बन्धुस्त्वे रायो मे रायो मा वयँ रायस्पोषेण वि यौष्म तोतो रायः ॥

अदित्याः। त्वा। मूर्द्धन्। आ। जिघर्मि। देवयजन इति देवऽयजने। पृथिव्याः। इडायाः। पदम्। असि। घृतवदिति घृतऽवत्। स्वाहा। अस्मेऽइत्यस्मे। रमस्व। अस्मेऽइत्यस्मे। ते। बन्धुः। त्वेऽइति त्वे। रायः। मेऽइति मे। रायः। मा। वयम्। रायः। पोषेण। वि। यौष्म। तोतः। रायः॥२२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. आचार्य विद्यार्थी को वेदज्ञान देकर कहता है कि ( अदित्याः ) = इस अखण्डन की कारणभूत वेदवाणी के ( मूर्धन् ) = शिखर पर ( त्वा ) = तुझे ( आजिघर्मि ) = सब प्रकार से दीप्त करता हूँ, अर्थात् तुझे उच्च वेदज्ञान प्राप्त कराता हूँ और साथ ही ( पृथिव्याः ) = इस पृथिवी के ( देवयजने ) = देवताओं से किये जानेवाले यज्ञों में ( आजिघर्मि ) = दीप्त करता हूँ। तू जहाँ ज्ञान से चमकता है वहाँ यज्ञों के द्वारा विख्यात होता है। 

२. ( इडायाः ) = वेदवाणी का तू ( पदम् असि ) = आधार, आश्रय है। वेदवाणी तुझमें स्थित हुई है। ( घृतवत् ) = इसीलिए तू मलों के क्षरण से ज्ञान की दीप्तिवाला बना है। [ घृ = क्षरण तथा दीप्ति ]। ( स्वाहा ) = तेरी चारों ओर प्रशंसा-ही-प्रशंसा है [ सु आह ]। 

३. हमारी यही प्रार्थना हो कि हे वेदवाणि! तू ( अस्मे ) = हममें ( रमस्व ) = रमण कर। ( अस्मे ) = हममें ( ते ) = तेरा ( बन्धुः ) = बन्धुत्व हो। ( त्वे रायः ) = तेरी सम्पत्तियाँ ही ( मे रायः ) = मेरी सम्पत्तियाँ हों। 

४. ( वयम् ) = हम ज्ञानरूप सम्पत्ति को प्राप्त करके इस सांसारिक ( रायस्पोषेण ) = धन के पोषण से ( मा ) = मत ( वियौष्म ) = पृथक् हों। हमारी ( रायः ) = सम्पत्तियाँ ( तोतो ) [ तु गतिवृद्धि- हिंसासु ] =  [ क ] हमें क्रियाशील बनाये रक्खें, इन्हें प्राप्त करके हम अकर्मण्य न हो जाएँ। [ ख ] ये सम्पत्तियाँ हमारे वर्धन का कारण हों। इनके कारण वैषयिक वृत्तिवाले होकर हम ह्रास की ओर न चले जाएँ। [ ग ] ये धन हमारी सब दुर्गतियों की हिंसा करनेवाले हों।

‘तोतो’ शब्द महीधर के अनुसार कलत्र [ स्त्री ] के अर्थ में निपात है। तब अर्थ इस प्रकार होगा कि हमारी सम्पत्तियाँ कलत्र में स्थित हों, अर्थात् हमारे घरों में सम्पत्तियों के संग्रह व व्यय का कार्य स्त्रियों के अधीन हो। ‘पुरुष कमाये स्त्री व्यय करे, जोड़े’ यही तो गृहस्थ का सुन्दर नियम है।
Essence
भावार्थ — हम वेदज्ञान के शिखर पर पहुँचें तो साथ ही यज्ञशील भी बनें। हम धन कमाएँ, परन्तु वह धन हमारे ह्रास का कारण न बने।
Subject
ज्ञानपूर्वक कर्म