Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 20

37 Mantra
4/20
Devata- वाग्विद्युतौ देवते Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- साम्नी जगती,भूरिक् आर्षी उष्णिक् Swara- निषादः
Mantra with Swara
अनु॑ त्वा मा॒ता म॑न्यता॒मनु॑ पि॒ताऽनु भ्राता॒ सग॒र्भ्योऽनु॒ सखा॒ सयू॑थ्यः। सा दे॑वि दे॒वमच्छे॒हीन्द्रा॑य॒ सोम॑ꣳ रु॒द्रस्त्वा॑वर्त्तयत् स्वस्ति सोम॑सखा॒ पुन॒रेहि॑॥२०॥

अनु॑। त्वा॒। मा॒ता। म॒न्य॒ता॒म्। अनु॑। पि॒ता। अनु॑। भ्राता॑। सग॑र्भ्य॒ इति॒ सऽग॑र्भ्यः। अनु॑। सखा॑। सयू॑थ्य॒ इति॒ सऽयू॑थ्यः। सा। दे॒वि॒। दे॒वम्। अच्छ॑। इ॒हि॒। इन्द्रा॑य। सोम॑म्। रु॒द्रः। त्वा॒। आ। व॒र्त्त॒य॒तु॒। स्व॒स्ति॑। सोम॑स॒खेति॒ सोम॑ऽसखा। पुनः॑। आ। इ॒हिः॒ ॥२०॥

Mantra without Swara
अनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्या नु सखा सयूथ्यः । सा देवि देवमच्छेहीन्द्राय सोमँ रुद्रस्त्वा वर्तयतु स्वस्ति सोमसखा पुनरेहि ॥

अनु। त्वा। माता। मन्यताम्। अनु। पिता। अनु। भ्राता। सगर्भ्य इति सऽगर्भ्यः। अनु। सखा। सयूथ्य इति सऽयूथ्यः। सा। देवि। देवम्। अच्छ। इहि। इन्द्राय। सोमम्। रुद्रः। त्वा। आ। वर्त्तयतु। स्वस्ति। सोमसखेति सोमऽसखा। पुनः। आ। इहिः॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में वर्णित वेदवाणी के अध्ययन के लिए जब विद्यार्थी आचार्यकुल में जाता है तब कहीं माता-पिता आदि का मोह उसके मार्ग में प्रतिबन्धक न हो जाए, अतः कहते हैं कि २. वेदवाणी के अध्ययन के लिए जाते हुए ( त्वा ) = तुझे ( माता ) = माता ( अनुमन्यताम् ) =  अनुमति दे। ( पिता अनुमन्यताम् ) = पिता भी अनुमति दें। ( सगर्भ्यः भ्राता ) = सहोदर भाई ( अनुमन्यताम् ) = अनुकूल मति दे। ( सयूथ्यः सखा ) = समान यूथ में रहनेवाला, एक ही पार्टी में रहनेवाला साथी भी ( अनुमन्यताम् ) = वेदाध्ययन के लिए जाने की स्वीकृति दे, अर्थात् उसे आचार्यकुल में शिक्षा प्राप्ति के लिए जाने की सभी स्वीकृति दें। सारा वातावरण उसके अनुकूल हो। 

३. सबकी अनुमति से आचार्यकुल में जाकर यह वेदाध्ययन करता है और वेदवाणी को ही सम्बोधित करके कहता है कि हे ( देवि ) = ज्ञान का प्रकाश देनवाली वेदवाणि! ( सा ) = वह तू ( देवम् अच्छ ) = उस प्रभु की ओर ( इहि ) = [ गमय ] हमें प्राप्त करा। तेरे ज्ञान-प्रकाश को प्राप्त करके हम प्रभु का ज्ञान व दर्शन करनेवाले बन सकें। ( इन्द्राय ) = इस परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिए ( सोमम् ) = सोम को, वीर्यशक्ति को ( इहि ) = [ गमय ] प्राप्त करा, क्योंकि इस सोम की रक्षा के बिना हम वेदवाणी को समझ न पाएँगे। ज्ञानाङ्गिन का ईंधन यह सोम ही है। 

४. हे वेदवाणि! ( रुद्रः ) = [ रुत् र ] ज्ञानोपेदश को देनेवाला आचार्य ( त्वा ) = तेरा ( आवर्तयतु ) =  आवर्तन कराए। आचार्य से कराया गया आवर्तन ही हमें वेदवाणी का आधिपत्य प्राप्त कराता है। इस आवर्तन के बिना हम वेद को समझ नहीं सकते। ( स्वस्ति ) = इस अध्ययन से हमारा कल्याण हो, हमारा जीवन उत्तम बने। 

५. प्रभु इस वेदाध्ययन करनेवाले ‘वत्स’ से कहते हैं कि ( सोमसखा ) = सोम का मित्र बनकर, वीर्यशक्ति का रक्षक बनकर ( पुनः एहि ) = तू फिर अपने घर ब्रह्मलोक को प्राप्त कर। अथवा माता-पिता आदि ही वेदाध्ययन के लिए जाने की अनुमति देते हुए कहते हैं कि सोमसखा बनकर तूने फिर आना। वस्तुतः यही लौटना तो वैदिक संस्कृति में ‘समावर्त्तन’ है। सोमसखा ही ब्रह्मचारी है। वह आचार्यकुल से लौटकर अपने ज्ञान व आचरण से सबका प्रिय बनता है और इस प्रकार सचमुच ‘वत्स’ नामवाला होता है।
Essence
भावार्थ — हम माता-पितादि की स्वीकृति से आचार्यकुल में जाएँ। वहाँ वेदाध्ययन करके अपने जीवन को उत्तम बनाकर पुनः वापस आएँ।
Subject
सोमसखा का समावर्त्तन