Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 17

37 Mantra
4/17
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- आर्ची त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒षा ते॑ शुक्र त॒नूरे॒तद्वर्च॒स्तया॒ सम्भ॑व॒ भ्राज॑ङ्गच्छ। जूर॑सि धृ॒ता मन॑सा॒ जुष्टा॒ विष्ण॑वे॥१७॥

ए॒षा। ते॒। शु॒क्र॒। त॒नूः। एतत्। वर्चः॑। तया॑। सम्। भ॒व॒। भ्राज॑म्। ग॒च्छ॒। जूः। अ॒सि॒। धृ॒ता। मन॑सा। जुष्टा॑। विष्ण॑वे ॥१७॥

Mantra without Swara
एषा ते शुक्र तनूरेतद्वर्चस्तया सम्भव भ्राजङ्गच्छ । जूरसि धृता मनसा जुष्टा विष्णवे ॥

एषा। ते। शुक्र। तनूः। एतत्। वर्चः। तया। सम्। भव। भ्राजम्। गच्छ। जूः। असि। धृता। मनसा। जुष्टा। विष्णवे॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु वत्स को सम्बोधित करते हैं कि हे ( शुक्र ) = दीप्त ज्ञानवाले [ शुच् दीप्तौ ], शुचि मनवाले अथवा [ शुक् गतौ ] क्रियाशील जीव! ( एषा ) = यह ( ते ) = तेरे लिए ( तनूः ) = शरीर है [ तन् विस्तारे ] सब विस्तृत शक्तियों से सम्पन्न यह शरीर तुझे दिया गया है। इस शरीर में ( एतत् वर्चः ) = यह शक्ति है—‘सोम’—वीर्यशक्ति तुझे प्राप्त कराई गई है। ( तया ) = इस शक्ति से ( सम्भव ) = तुझे उत्तम सन्तान को जन्म देना है और ( भ्राजं गच्छ ) = ज्ञानदीप्ति को प्राप्त करना है। सोमशक्ति के मुख्यरूप से दो ही प्रयोजन हैं—सन्तान-निर्माण तथा ज्ञानाङ्गिन का दीपन अथवा बुद्धि को तीव्र करना। 

२. ( जूः असि ) = तू ‘जव’ = वेगवाला है। स्फूर्ति के साथ सब कार्यों को करनेवाला है। तूने उस-उस समय पर उस-उस कार्यभार के जुए [ yoke ] को ( मनसा धृता ) = मन से धारण किया है। तूने कर्त्तव्य समझकर उन सब कर्मों को किया है, तुझे ये बोझरूप नहीं लगे। तूने इस कार्यभार का ( विष्णवे जुष्टा ) = व्यापक उन्नति के लिए ही सेवन किया है। कर्त्तव्यबुद्धि से इन नियत श्रेष्ठतम कर्मों को करने से तेरा शरीर, मन व बुद्धि सभी उन्नत हुए हैं, सभी सबल बने हैं। 

३. वस्तुतः शरीर में वर्चस् की रक्षा करने पर ये परिणाम स्वाभाविक हैं कि मनुष्य स्वस्थ शरीर हो, निर्मल मनवाला बने और तीव्र बुद्धिवाला हो।
Essence
भावार्थ — हम वीर्य की रक्षा के द्वारा विविध प्रकार की उन्नति करें और इस प्रकार व्यापक उन्नति करनेवाले ‘विष्णु’ बनें। विष्णु बनकर ही हम उस ‘विष्णु’ को प्राप्त करेंगे [ विष्णुर्भूत्वा भजेद् विष्णुम्। ]
Subject
शरीर क्यों ? प्रभु-प्राप्ति के लिए