Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 13

37 Mantra
4/13
Devata- आपो देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषयः Chhand- भूरिक् आर्षी बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒यं ते॑ य॒ज्ञिया॑ त॒नूर॒पो मु॑ञ्चामि॒ न प्र॒जाम्। अ॒ꣳहो॒मुचः॒ स्वाहा॑कृताः पृथि॒वीमावि॑शत पृथि॒व्या सम्भ॑व॥१३॥

इ॒यम्। ते॒। य॒ज्ञिया॑। त॒नूः। अ॒पः। मु॒ञ्चा॒मि॒। न। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। अ॒ꣳहो॒मुच॒ इत्य॑ꣳह॒ऽमुचः॑। स्वाहा॑कृता॒ इति॒ स्वाहा॑ऽकृताः। पृ॒थि॒वीम्। आ। वि॒श॒त॒। पृ॒थि॒व्या। सम्। भ॒व॒ ॥१३॥

Mantra without Swara
इयन्ते यज्ञिया तनूरपो मुञ्चामि न प्रजाम् । अँहोमुचः स्वाहाकृताः पृथिवीमाविशत । पृथिव्या सम्भव ॥

इयम्। ते। यज्ञिया। तनूः। अपः। मुञ्चामि। न। प्रजामिति प्रऽजाम्। अꣳहोमुच इत्यꣳहऽमुचः। स्वाहाकृता इति स्वाहाऽकृताः। पृथिवीम्। आ। विशत। पृथिव्या। सम्। भव॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की समाप्ति इन शब्दों पर है कि ये जल हममें यज्ञिय भावना की वृद्धि करनेवाले होते हैं। इस यज्ञिय भावनावाले आङ्गिरस से प्रभु स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ( इयम् ) = यह ( ते तनूः ) = तेरा शरीर ( यज्ञिया ) = यज्ञिय है। तू इसे ( अयज्ञिय ) = अपवित्र, भोगभावना प्रधान न बना देना। तू निश्चय कर कि मैं ( अपः ) = शरीर से मलों को दूर करनेवाले जलों को लघुशंका द्वारा ( मुञ्चामि ) = छोड़ता हूँ, ( न प्रजाम् ) = सन्तान के साधनभूत वीर्य को नहीं छोड़ता, क्षणिक आनन्द के लिए उसका नाश नहीं होने देता। 

२. ये वीर्यकण तो ( अंहोमुचः ) = सब प्रकार के पापों व कष्टों से बचानेवाले हैं। इनके शरीर में सुरक्षित होने पर न पापवृत्ति उद्बुद्ध होती है और न ही रोगादि का कष्ट होता है। ( स्वाहाकृताः ) = ये यज्ञ के उद्देश्य से ही उत्पन्न किये गये हैं। ‘स्वाहा अग्नि की पत्नी है, यज्ञशक्ति है [ created for the sacrifice ]। इनकी रक्षा में ही यज्ञियवृत्ति की रक्षा है। 

३. इसलिए हे जीव! तू ऐसा निश्चय कर कि तूने इन सोमकणों की अवश्य रक्षा करनी है। तू इन्हें सम्बोधन करके कह कि ( पृथिवीम् आविशत ) = तुम इस शरीर में प्रवेश करो। इसी में तुम्हारा व्यापन हो। हाँ, ( पृथिव्याः ) = इस पृथिवीरूप शरीर से निकलकर हे सोम! तू ( सम्भव ) = सन्तान को जन्म देनेवाला हो।
Essence
भावार्थ — आङ्गिरस ऋषि वीर्य के दो प्रयोजन समझता है। [ क ] शरीर में व्याप्त होकर उसे शारीरिक व मानस रोगों से बचाना तथा [ ख ] उचित योनि में निक्षिप्त होकर सन्तान को जन्म देना।
Subject
वीर्यरक्षा = ‘ब्रह्मचर्य’