Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 11

37 Mantra
4/11
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषयः Chhand- स्वराट् ब्राह्मी अनुष्टुप्,आर्षी उष्णिक् Swara- गान्धारः, ऋषभः
Mantra with Swara
व्र॒तं कृ॑णुता॒ग्निर्ब्रह्मा॒ग्निर्य॒ज्ञो वन॒स्पति॑र्य॒ज्ञियः॑। दैवीं॒ धियं॑ मनामहे सुमृडी॒काम॒भिष्ट॑ये वर्चो॒धां य॒ज्ञवा॑हसꣳ सुती॒र्था नो॑ऽअस॒द्वशे॑। ये दे॒वा मनो॑जाता मनो॒युजो॒ दक्ष॑क्रतव॒स्ते नो॒ऽवन्तु॒ ते नः॑ पान्तु॒ तेभ्यः॒ स्वाहा॑॥११॥

व्रतम्। कृ॒णु॒त॒। अ॒ग्निः। ब्रह्म॑। अ॒ग्निः। य॒ज्ञः। वन॒स्पतिः॑। य॒ज्ञियः॑। दैवी॑म्। धिय॑म्। म॒ना॒म॒हे॒। सु॒मृ॒डी॒कामिति॑ सुऽमृडी॒काम्। अ॒भिष्ट॑ये। व॒र्चो॒धामिति॑ वर्चः॒ऽधाम्। य॒ज्ञवा॑हस॒मिति॑ य॒ज्ञऽवा॑हसम्। सु॒ती॒र्थेति॑ सु॒ऽती॒र्था। नः॒। अ॒स॒त्। वशे॑। ये। दे॒वाः। मनो॑जाता॒ इति॒ मनः॑ऽजाताः। म॒नो॒यु॒ज॒ इति॑ मनः॒ऽयुजः॑। दक्ष॑ऽक्रतव॒ इति॒ दक्ष॑ऽक्रतवः। ते। नः॒। अ॒व॒न्तु॒। ते। नः॒। पा॒न्तु॒। तेभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥११॥

Mantra without Swara
व्रतङ्कृणुत व्रतङ्कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो वनस्पतिर्यज्ञियः दैवीन्धियम्मनामहे सुमृडीकामभिष्टये वर्चाधाँ यज्ञवाहसँ सुतीर्था नो असद्वशे । ये देवा मनोजाता मनोयुजो दक्षक्रतवस्ते नो वन्तु ते नः पान्तु तेभः स्वाहा ॥

व्रतम्। कृणुत। अग्निः। ब्रह्म। अग्निः। यज्ञः। वनस्पतिः। यज्ञियः। दैवीम्। धियम्। मनामहे। सुमृडीकामिति सुऽमृडीकाम्। अभिष्टये। वर्चोधामिति वर्चःऽधाम्। यज्ञवाहसमिति यज्ञऽवाहसम्। सुतीर्थेति सुऽतीर्था। नः। असत्। वशे। ये। देवाः। मनोजाता इति मनःऽजाताः। मनोयुज इति मनःऽयुजः। दक्षऽक्रतव इति दक्षऽक्रतवः। ते। नः। अवन्तु। ते। नः। पान्तु। तेभ्यः। स्वाहा॥११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे मनुष्यो! ( व्रतं कृणुत ) = गत मन्त्र में वर्णित यज्ञ का तुम व्रत लो। ( व्रतं कृणुत ) =  अवश्य व्रत लो। ( ब्रह्म अग्निः ) =  प्रभु तुम्हें आगे ले-चलनेवाले हैं। प्रभु की उपासना मनुष्य की उन्नति का कारण होती है। ( अग्निः यज्ञः ) = यह यज्ञ अग्रेणी है, हमारी उन्नति का कारण है। प्रभु की उपासना ‘ब्रह्मयज्ञ’ है। अग्नि के अन्दर घृतादि पदार्थों की आहुति देना ‘देवयज्ञ’ है। 

२. इन यज्ञों की वृत्ति को अपने अन्दर जगाने के लिए यह आवश्यक है कि हम ध्यान रक्खें कि ( वनस्पतिः ) = वनस्पति ही ( यज्ञियः ) = यज्ञ के योग्य बनानेवाली है। मांसभोजन से अयज्ञिय वृत्ति उत्पन्न होती है। हम सात्त्विक भोजनों के द्वारा ( दैवीं धियम् ) = दैवी सम्पत्ति का वर्धन करनेवाली बुद्धि को ( मनामहे ) = माँगते हैं [ मनामहे = याचामहे—द० ] जो ‘दैवी धी’ ( सुमृडीकाम् ) = उत्तम सुखों को देनेवाली है। ( अभिष्टये ) = यह ‘दैवी धी’ ही सब इष्टों की प्राप्ति के लिए है। देव यज्ञशील हैं, यह यज्ञ ‘इष्टकामधुक्’ है, सब इष्ट कामनाओं का पूरण करनेवाला है। ( वर्चोधाम् ) = यह ‘दैवी धी’ हमें अपवित्र भोगमार्ग से बचाती है और हममें वर्चस् का, शक्ति का स्थापन करती है। ( यज्ञवाहसम् ) = ‘दैवी धी’ यज्ञों को प्राप्त करानेवाली है और इस प्रकार यह ( सुतीर्था ) = उत्तम तीर्थ है। बड़ी उत्तमता से भवसागर से तरानेवाली है। यह ‘दैवी धी’ ही ( नः ) = हमारी ( वशे ) = इच्छा में ( असत् ) = रहे, अर्थात् हम सदा इस दिव्य बुद्धि की कामना करें। 

३. इस दिव्य बुद्धि की प्राप्ति के लिए ( ये ) = जो ( देवाः ) = देव ( मनोजाताः ) = [ मनसा विज्ञाने च जायन्ते—द० ] ज्ञान से विकास को प्राप्त हुए हैं, अर्थात् स्वयं विकसित ज्ञानवाले हैं और ( मनोयुजः ) = [ विज्ञाने योजयन्ति—द० ] औरों को भी ज्ञान से युक्त करते हैं, ( दक्षक्रतवः ) = शरीर व आत्मा के बल [ दक्ष ] तथा प्रज्ञा व यज्ञ [ क्रतु ] से युक्त हैं ( ते ) = वे देव ( नः ) = हमें ( अवन्तु ) = रक्षित करें। हमें वासनाओं का शिकार होने से बचाएँ। ( ते नः पान्तु ) = वे हमें रोगों से भी बचाएँ। अपने ‘क्रतु’ द्वारा यदि वे हमें वासनाओं से बचाते हैं तो ‘दक्ष’ द्वारा वे हमें रोगों से सुरक्षित करते हैं। ( तेभ्यः स्वाहा ) = इन देवों के लिए हम अपना समर्पण करते हैं।
Essence
भावार्थ — हम यज्ञ का व्रत धारण करें। यह दिव्य बुद्धि हमें भवसागर से तराएगी। देवता हमें शरीर के रोगों से बचाते हैं तो मानस मलों को भी दूर करते हैं।
Subject
दिव्य-धी-मनन [ दिव्य बुद्धि की याचना ]