Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 1

37 Mantra
4/1
Devata- अबोषध्यौ देवते Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- विराट् ब्राह्मी जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
एदम॑गन्म देव॒यज॑नं पृथि॒व्या यत्र॑ दे॒वासो॒ऽअजु॑षन्त॒ विश्वे॑। ऋ॒क्सा॒माभ्या॑ स॒न्तर॑न्तो॒ यजु॑र्भी रा॒यस्पोषे॑ण॒ समि॒षा म॑देम। इ॒माऽआपः॒ शमु॑ मे सन्तु दे॒वीरोष॑धे॒ त्राय॑स्व॒ स्वधि॑ते॒ मैन॑ꣳहिꣳसीः॥१॥

आ। इ॒दम्। अ॒ग॒न्म॒। दे॒व॒यज॑न॒मिति॑ देव॒यज॑नम्। पृ॒थि॒व्याः। यत्र॑। दे॒वासः॑। अजु॑षन्त। विश्वे॑। ऋ॒क्सा॒माभ्या॒मित्यृ॑क्ऽसा॒माभ्या॑म्। स॒न्तर॑न्त॒ इति॑ स॒म्ऽतर॑न्तः। यजु॑र्भि॒रिति॒ यजुः॑ऽभिः। रा॒यः। पोषे॑ण। सम्। इ॒षा। म॒दे॒म॒। इ॒माः। आपः॑। शम्। ऊँ॒ऽइ॒त्यूँ॑। मे॒। स॒न्तु॒। दे॒वीः। ओष॑धे। त्राय॑स्व। स्वधि॑त॒ इति॒ स्वऽधि॑ते। मा। ए॒न॒म्। हि॒ꣳसीः॒ ॥१॥

Mantra without Swara
एदमगन्म देवयजनम्पृथिव्या यत्र देवासो अजुषन्त विश्वे । ऋक्सामाभ्याँ सन्तरन्तो यजुर्भी रायस्पोषेण समिषा मदेम । इमा आपः शमु मे सन्तु देवीरोषधे त्रायस्व । स्वधिते मैनँ हिँसीः ॥

आ। इदम्। अगन्म। देवयजनमिति देवयजनम्। पृथिव्याः। यत्र। देवासः। अजुषन्त। विश्वे। ऋक्सामाभ्यामित्यृक्ऽसामाभ्याम्। सन्तरन्त इति सम्ऽतरन्तः। यजुर्भिरिति यजुःऽभिः। रायः। पोषेण। सम्। इषा। मदेम। इमाः। आपः। शम्। ऊँऽइत्यूँ। मे। सन्तु। देवीः। ओषधे। त्रायस्व। स्वधित इति स्वऽधिते। मा। एनम्। हिꣳसीः॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. तृतीय अध्याय की समाप्ति पर ‘नारायण’ यज्ञात्मक कर्मों में लगा था। यह नारायण ही ‘प्रजापति’ = प्रजा का रक्षक बनता है और प्रार्थना करता है— १. हम ( पृथिव्याः ) = पृथिवी के ( इदं देवयजनम् ) = इस देवताओं के यज्ञ करने के भाव को [ भावे ल्युट् ] ( आ अगन्म ) =  सर्वथा प्राप्त हों। प्रभु ने पृथिवी को देवयजनी बनाया है। हम इस पृथिवी पर आकर यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहें, जिससे अपने देवत्व को न खो बैठें। 

२. ( यत्र ) = यह पृथिवी वह स्थान है जहाँ कि ( विश्वे देवासः ) = सब देववृत्ति के लोग ( अजुषन्त ) = [ जुषी प्रीतिसेवनयोः ] परस्पर प्रीतिपूर्वक अपने कर्त्तव्यों का सेवन करते हैं। अथवा बड़े प्रेम से प्रभु का उपासन करते हैं। 

३. यहाँ हम अपने कर्त्तव्य-कर्मों को ( ऋक्सामाभ्याम् ) = ऋचा व साम के द्वारा — विद्या व श्रद्धा से— ( सन्तरन्तः ) = तैरते = करते हुए, पार कर जाएँ, अर्थात् अपने प्रत्येक कार्य को सफल बनानेवाले हों। ‘यदेव श्रद्धया क्रियते विद्यया तदेव वीर्यवत्तरं भवति’ उपनिषद् यही कहती है कि जो काम श्रद्धा व विद्या से किया जाता है वही वीर्यवत्तर, शक्तिशाली होता है। 

४. ( यजुर्भिः ) = यजुओं से—यजुर्वेद में वर्णित यज्ञिय उत्तम कर्मों से ही ( रायस्पोषेण ) = धन के पोषण से हम ( संमदेम ) = सम्यक् आनन्द का अनुभव करें। उत्तम मार्ग से धन कमाने का निश्चय होते ही संसार सुन्दर बन जाता है। 

५. हम धनी बनकर भी ( इषा ) = अन्न से ही ( मदेम ) = आनन्दित हों। हम स्वाद को प्रधानता न दें। ( उ ) = और ( इमाः आपः ) = ये जल ( मे ) = मेरे लिए ( शं सन्तु ) = शान्ति देनेवाले हों। ( देवीः ) = ये तो दिव्य गुणों से परिपूर्ण हैं, अर्थात् मेरा खान-पान सादा हो। सच्ची बात यह है कि उत्तम जीवन का आधार यह खान-पान की सादगी ही है। 

६. ( ओषधे ) = हे दोषों को दूर करने की शक्ति से परिपूर्ण ओषधे! ( त्रायस्व ) = तू मेरी रक्षा कर। ( स्वधिते ) = हे अपनी धारणशक्ति से युक्त ओषधे! ( एनं मा हिंसी ) = इस मुझे हिंसित मत कर। यह ओषधि-वनस्पतियों का सेवन हमारा रक्षण करे, केवल शरीर से नहीं, यह मन व मस्तिष्क को भी स्वस्थ बनाये।
Essence
भावार्थ — १. पृथिवी को हम यज्ञभूमि समझें। २. देव बनकर अपना कर्त्तव्य प्रेम से पूर्ण करें। ३. हमारे सब कार्य ज्ञान व श्रद्धा से किये जाएँ। ४. श्रेष्ठतम कर्मों से ही हम धन कमाएँ। ५. ‘सादा खाना और पानी पीना’ ही हमारे आनन्द का कारण बने। ओषधियाँ धारणशक्ति से युक्त हों, इनसे हम हिंसित न हों।
Subject
सादा खाना, पानी पीना