Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 7

28 Mantra
38/7
Devata- वातो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- अष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स॒मु॒द्राय त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑। सरि॒राय॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑।अ॒ना॒धृ॒ष्याय॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑। अ॒प्र॒ति॒धृ॒ष्याय॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑।अ॒व॒स्यवे॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑। अ॒शि॒मि॒दाय॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑॥७॥

स॒मुद्राय॑। त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑। स॒रि॒राय॑। त्वा॒। वाता॑य॒। स्वाहा॑। अ॒ना॒धृष्याय॑। त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑। अ॒प्र॒ति॒धृ॒ष्यायेत्य॑प्रति॑ऽधृ॒ष्याय॑। त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑। अ॒व॒स्यवे॑ त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑। अ॒शि॒मि॒दायेत्य॑शिमि॒ऽदाय॑। त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑ ॥७ ॥

Mantra without Swara
समुद्राय त्वा वाताय स्वाहा सरिराय त्वा वाताय स्वाहा । अनाधृष्याय त्वा वाताय स्वाहा प्रतिधृष्याय त्वा वाताय स्वाहा । अवस्यवे त्वा वाताय स्वाहाशिमिदाय त्वा वाताय स्वाहा ॥

समुद्राय। त्वा। वाताय। स्वाहा। सरिराय। त्वा। वाताय। स्वाहा। अनाधृष्याय। त्वा। वाताय। स्वाहा। अप्रतिधृष्यायेत्यप्रतिऽधृष्याय। त्वा। वाताय। स्वाहा। अवस्यवे त्वा। वाताय। स्वाहा। अशिमिदायेत्यशिमिऽदाय। त्वा। वाताय। स्वाहा॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
आचार्य दयानन्द लिखते हैं कि प्रस्तुत मन्त्रों का विषय है 'विवाह किये स्त्री-पुरुष क्या करें?' प्रस्तुत मन्त्र में पत्नी कहती है कि मैं १. (समुद्राय) = सदा प्रसन्न रहनेवाले (त्वा) = आपके प्रति (वाताय) = वायु के समान अविच्छिन्न गतिवाले के प्रति (स्वाहा) = अपना अर्पण करती हूँ, अपने पिता के घर को छोड़कर आपके समीप होती हूँ। २. (सरिराय) [ सरिर= सलिल - जल ] जल के समान शान्त (वाताय त्वा) = वायु के समान क्रियाशील आपके लिए (स्वाहा) = अपना अर्पण करती हूँ। ३. (अनाधृष्याय) = वासनाओं से धर्षित न होनेवाले (वाताय त्वा) = गतिशील आपके लिए (स्वाहा) = अपने को सौंपती हूँ। ४. (अ-प्रति धृष्याय) = प्रत्येक का धर्षण न करनेवाले, अर्थात् औरों को व्यर्थ ही अन्यायरूप से न दबानेवाले (वाताय) = आलस्यशून्य आपके लिए (स्वाहा) = मैं त्याग करती हूँ। ५. (अवस्यवे) = संसार की सब विषय-वासनाओं से रक्षा चाहनेवाले (वाताय त्वा) = गति के द्वारा सब बुराइयों का हिंसन करनेवाले आपके लिए (स्वाहा) = [सु आह] मैं शुभ शब्दों का उच्चारण करनेवाली होती हूँ। ६. (अ-शिमि-दाय) = [शिमिति कर्मनाम शामयतेर्वा = शक्नोतेर्वा - नि० ५।१२] कर्मों को न छोड़नेवाले के लिए (वाताय) = क्रियाशील के लिए (स्वाहा) = मैं सदा शुभ शब्दों को बोलनेवाली बनती हूँ। ('जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवान्') = माधुर्यवाली, शान्तिप्रद वाणी बोलनी ही चाहिए। ७. एवं प्रस्तुत मन्त्र में पति की विशेषताएँ इस रूप में दर्शाई गई हैं- [क] वह सदा प्रसन्न रहनेवाला हो-क्रोध न करे, [ख] जल की भाँति शान्त स्वभाववाला हो, [ग] दबे नहीं, [घ] दबाये नहीं, [ङ] वासनाओं से अपनी रक्षा करना चाहे, [च] कभी कर्मों को न छोड़े, क्योंकि कर्म ही शान्ति देते हैं, वासनाओं से बचाते हैं तथा शक्ति की वृद्धि करते हैं। उन कर्मों पर बल देने के लिए ही छह बार 'वाताय' कहा गया है, अर्थात् मनुष्य सदा पाँचों इन्द्रियों व छठे मन को अकर्मण्य न होने दे। एवं पति का सर्वमहान् गुण 'क्रियाशीलता' ही है। '
Essence
भावार्थ- पति 'प्रसन्न - शान्त, न दबनेवाला, न दबानेवाला, वासनाओं से ऊपर उठ कर्मों को कभी न छोड़नेवाला, वायु की भाँति सदा क्रियाशील' होना चाहिए।
Subject
क्रियाशील पति