Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 4

28 Mantra
38/4
Devata- सरस्वती देवता Rishi- आथर्वण ऋषिः Chhand- आर्ची पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒श्विभ्यां॑ पिन्वस्व॒ सर॑स्वत्यै पिन्व॒स्वेन्द्राय॑ पिन्वस्व।स्वाहेन्द्र॑व॒त् स्वाहेन्द्र॑व॒त् स्वाहेन्द्र॑वत्॥४॥

अ॒श्विभ्या॑म् पि॒न्वस्व॒। सर॑स्वत्यै। पि॒न्व॒स्व॒। इन्द्रा॑य। पि॒न्व॒स्व॒ ॥ स्वाहा॑। इन्द्र॑व॒दितीन्द्र॑ऽवत्। स्वाहा॑। इन्द्र॑व॒दितीन्द्र॑ऽवत्। स्वाहा॑। इन्द्र॑व॒दितीन्द्र॑ऽवत् ॥४ ॥

Mantra without Swara
अश्विभ्याम्पिन्वस्व सरस्वत्यै पिन्वस्वेन्द्राय पिन्वस्व । स्वाहेन्द्रवत्स्वाहेन्द्रवत्स्वाहेन्द्रवत् ॥

अश्विभ्याम् पिन्वस्व। सरस्वत्यै। पिन्वस्व। इन्द्राय। पिन्वस्व॥ स्वाहा। इन्द्रवदितीन्द्रऽवत्। स्वाहा। इन्द्रवदितीन्द्रऽवत्। स्वाहा। इन्द्रवदितीन्द्रऽवत्॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अश्विभ्याम्) = प्राणापानों के लिए (पिन्वस्व) = तू अपने को प्रीणित कर, उत्साहित कर, अर्थात् प्राणापान की साधना करने के लिए [पिन्व्-जिन्व्= to urge on ] तू अपने को उत्साहित करनेवाली हो। २. (सरस्वत्यै) = ज्ञान व शिक्षा के लिए (पिन्वस्व) = तू उत्साह-सम्पन्न हो । ज्ञान में तेरी रुचि हो- सुशिक्षित होने की तेरी प्रबल कामना हो । ३. (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय बनने के लिए पिन्वस्व तुझमें सदा उत्साह हो । वस्तुतः 'प्राणसाधना, ज्ञान व शिक्षा तथा जितेन्द्रियता' ही में अध्यात्म - उन्नति की मौलिक बात है। प्राणसाधना से शरीर पूर्णतया नीरोग रहता है। ज्ञान व शिक्षा हमारे मस्तिष्क को स्वस्थ बनाते हैं तथा जितेन्द्रियता मानस - पवित्रता का मूल बनती है। ४. [क] इस प्रकार हम प्राणशक्ति सम्पन्न बनते हैं। इस प्राणशक्ति के सम्पादन करनेवाले को प्रभु कहते हैं कि (इन्द्रवत्) = हे प्राण-शक्तिसम्पन्न [प्राण एवेन्द्र :- श० १२ १९ | १ | १४ ] तू (स्वाहा) = स्वार्थ के त्यागवाला बन। [ख] जब हम सरस्वती की साधना करके ज्ञान व शिक्षा का सम्पादन करते हैं तब प्रभु कहते हैं कि (इन्द्रवत्) = हे ज्ञानरूप परमैश्वर्यवाले जीव ! तू स्वाहा स्वार्थत्यागवाला बन। [ग] जितेन्द्रियता को सिद्ध करके 'इन्द्र' बननेवाले इस साधक से प्रभु कहते हैं कि (इन्द्रवत्) = [हृदयमेवेन्द्रः - श० १२|९| १ | १५] हे उत्तम मन व हृदयवाले जीव ! तू (स्वाहा) = स्वार्थत्याग करनेवाला बन। वस्तुतः स्वार्थत्याग के बिना प्राणापान व जितेन्द्रियता का साधन नहीं हो सकता।
Essence
भावार्थ- हम प्राणसाधना, ज्ञान, व जितेन्द्रियता के लिए सदा उत्साह धारण करें ।