Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 26

28 Mantra
38/26
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- स्वराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
याव॑ती॒ द्यावा॑पृथि॒वी याव॑च्च स॒प्त सिन्ध॑वो वितस्थि॒रे।ताव॑न्तमिन्द्र ते॒ ग्रह॑मू॒र्जा गृ॑ह्णा॒म्यक्षि॑तं॒ मयि॑ गृह्णा॒म्यक्षि॑तम्॥२६॥

याव॑ती॒ऽइति॒ याव॑ती। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। याव॑त्। च॒। स॒प्त। सिन्ध॑वः। वि॒त॒स्थि॒रे इति॑ विऽतस्थि॒रे ॥ ताव॑न्तम्। इ॒न्द्र॒। ते॒। ग्र॑हम्। ऊ॒र्जा। गृ॒ह्णा॒मि॒। अक्षि॑तम्। मयि॑। गृ॒ह्णा॒मि॒। अक्षि॑तम् ॥२६ ॥

Mantra without Swara
यावती द्यावापृथिवी यावच्च सप्त सिन्धवो वितस्थिरे । तवन्तमिन्द्र ते ग्रहमूर्जा गृह्णाम्यक्षितम्मयि गृह्णाम्यक्षितम् ॥

यावतीऽइति यावती। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। यावत्। च। सप्त। सिन्धवः। वितस्थिरे इति विऽतस्थिरे॥ तावन्तम्। इन्द्र। ते। ग्रहम्। ऊर्जा। गृह्णामि। अक्षितम्। मयि। गृह्णामि। अक्षितम्॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
दीर्घतमा कहता है कि (यावती द्यावापृथिवी) = जबतक ये द्युलोक और पृथिवीलोक हैं (च) = और (यावत्) = जबतक (सप्त सिन्धवः) = सातों समुद्र (वितस्थिरे) = विशेषरूप से अपनी मर्यादा में स्थित हैं (तावन्तम्) = उतने समय तक (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशाली प्रभो! (ते ग्रहम्) = आपके ग्रहण को (ऊर्जा) = बल और प्राणशक्ति के हेतु (गृह्णामि) = ग्रहण करता हूँ। (अक्षितम्) = आपका ग्रहण मेरी अक्षीणता का कारण बनता है। आपके ग्रहण के लिए मुझे कहीं दूर थोड़े ही जाना है (मयि) = अपने ही अन्दर (गृह्णामि) = मैं आपको ग्रहण करने के लिए यत्नशील होता हूँ, जिससे (अक्षितम्) = मेरा क्षत-विनाश न हो। १. जब तक द्युलोक और पृथिवीलोक विद्यमान हैं- जब तक समुद्र अपनी मर्यादा में स्थित है, तब तक मेरी उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को ग्रहण करने की साधना चलती रहे । २. इस प्रभु-ग्रहण की साधना ने ही मुझे बल व प्राणशक्ति प्राप्त करानी है। इसी साधना ने मुझे क्षय से बचाना है। प्रभु से दूर हुआ और मैं निर्बल होकर पिसा । ३. प्रभु का ग्रहण मुझे कहीं बाह्य संसार में नहीं करना, उसका ग्रहण तो मेरे ही अन्दर हो जाएगा। बाह्य वस्तुओं में प्रभु की महिमा का दर्शन अवश्य होता है, ऐसा करने परन्तु पर धीमे-धीमे उन वस्तुओं की ही पूजा आरम्भ हो जाती है। सूर्य में प्रभु महिमा का दर्शन करनेवला सूर्य का ही उपासक बन जाता है। मूर्त्तिपूजा का मूल इसी वृत्ति में है । इसलिए अन्दर ही प्रभु को देखना ठीक है।
Essence
भावार्थ- मैं सतत साधना के द्वारा प्रभु को अपने अन्दर ग्रहण करूँ, जिससे मुझे बल व प्राणशक्ति प्राप्त हो और मैं क्षीणता से बच सकूँ ।