Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 25

28 Mantra
38/25
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- साम्नी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
एधो॑ऽस्येधिषी॒महि॑ स॒मिद॑सि॒ तेजो॑ऽसि॒ तेजो॒ मयि॑ धेहि॥२५॥

एधः॑। अ॒सि॒। ए॒धि॒षी॒महि॑। स॒मिदिति॑ स॒म्ऽइत्। अ॒सि॒। तेजः॑। अ॒सि॒। तेजः॑। मयि॑। धे॒हि॒ ॥२५ ॥

Mantra without Swara
एधोस्येधिषीमहि समिदसि तेजो सि तेजो मयि धेहि ॥

एधः। असि। एधिषीमहि। समिदिति सम्ऽइत्। असि। तेजः। असि। तेजः। मयि। धेहि॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गतमन्त्र का द्रष्टा प्रभु का दर्शन करता है और विनय करता है कि- १. (एधः असि) = [एध वृद्धै] आप बढ़े हुए हैं। ('वर्धमानं स्वे दमे') = आप तो अपने स्वरूप में सदा से वृद्ध हैं। प्रत्येक गुण की चरम सीमा ही तो आप हैं। आप निरतिशय ज्ञान हैं, सर्वाधिक शक्ति हैं और परमैश्वर्यवाले हैं। २. (एधिषीमहि) = आपकी कृपा से हम भी बढ़ें। हम शारीरिक स्वास्थ्य को प्राप्त करें तो मानस नैर्मल्य व ज्ञान की दीप्ति को बढ़ानेवाले हों। आप ३. (समित्) [सम्+इन्ध] = उत्तम दीप्तिवाले (असि) = हैं। आप तो (तेजः असि) = तेज के पुञ्ज हैं - तेज-ही-तेज हैं, इस (तेज:) = तेज को मयि मुझमें धेहि धारण कीजिए । प्रभु सदा वर्धमान हैं- ज्ञान की दीप्ति से दीप्त हैं, तेज के पुञ्ज हैं। प्रभुकृपा से हम भी सदा वृद्धि को प्राप्त करें, हमारा ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता चले और हम तेज के बनें।
Essence
भावार्थ- प्रभुभक्त वर्धमान, ज्ञानी व तेजस्वी पुञ्ज बनता है।
Subject
प्रभु के तेज का धारण