Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 24

28 Mantra
38/24
Devata- सविता देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उद्व॒यन्तम॑स॒स्परि॒ स्वः पश्य॑न्त॒ऽ उत्त॑रम्।दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्॥२४॥

उत्। व॒यम्। तम॑सः। परि॑। स्व᳖रिति॒ स्वः᳖। पश्य॑न्तः। उत्त॑र॒मित्यु॑त्ऽत॑रम् ॥ दे॒वम्। दे॒व॒त्रेति॑ देव॒ऽत्रा। सूर्य्य॑म्। अग॑न्म। ज्योतिः॑। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम् ॥२४ ॥

Mantra without Swara
उद्वयन्तमसस्परि स्वः पश्यन्तऽउत्तरम् । देवन्देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥

उत्। वयम्। तमसः। परि। स्वरिति स्वः। पश्यन्तः। उत्तरमित्युत्ऽतरम्॥ देवम्। देवत्रेति देवऽत्रा। सूर्य्यम्। अगन्म। ज्योतिः। उत्तममित्युत्ऽतमम्॥२४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गतमन्त्र की निर्देषता के साधन के लिए प्रकृति से ऊपर उठकर प्रभु की ओर चलना ही मुख्य उपाय है, उसका उल्लेख प्रस्तुत मन्त्र में करते हैं- १. (वयम्) = हम (उत्) = इस उत्कृष्ट (तमसः) = अन्धकारमयी प्रकृति से (परि अगन्म) = ज़रा परे चलें। 'प्रकृति उत्कृष्ट है' इसमें सन्देह नहीं। इस सृष्टि में प्रभु ने प्रत्येक पदार्थ का निर्माण जीव के हित के लिए बड़ी सुन्दरता से किया है। प्रत्येक पदार्थ उत्तम है, सुन्दर और आकर्षक है। हम अपनी अल्पज्ञता के कारण उस पदार्थ की ओर आकृष्ट होकर उसका अतियोग कर बैठते हैं और हमारे लिए वह पदार्थ असुन्दर परिणामोंवाला हो जाता है। चिन्तन करने पर हम इनमें न फँसने का निश्चय करते हैं कि इस प्रकृति से हम अब ऊपर उठते हैं। इस भौतिक शरीर के लिए इन प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग करते हुए हम इसमें उलझते नहीं। इससे ऊपर उठकर २. (उत्तरम्) = चेतनता के कारण इस जड़ तमोमय प्रकृति से अधिक उत्कृष्ट (स्वः) = [स्वर् to radiate] उस देदीप्यमान आत्मज्योति को (पश्यन्तः) = देखते हुए हम इस संसार में चलते हैं। हम प्रतिदिन आत्मस्वरूप का चिन्तन करते हुए इसी परिणाम पर पहुँचते हैं कि यह प्रकृति हमारे लिए है, हम प्रकृति के लिए नहीं हैं। इस प्रकृति में छेदन - भेदन होने से यह 'तमस्' है, यह अन्धकारमयी है। आत्मा में यह छेदन-भेदन नहीं, वह (अच्छेद्य) = अभेद्य ज्योति है। ३. इस भावना के जागने पर हम देवत्रा देवम् देवों में देव, अर्थात् इन सब ज्योतिओं को भी ज्योतिर्मय करनेवाले (सूर्यम्) = [सुवति कर्मणि] सबको अपने-अपने कर्मों में प्रेरित करनेवाले (उत्तमं ज्योतिः) = उस सर्वाधिक निरतिशय ज्योति परमात्मा को अगन्म प्राप्त हों । जीव चेतन है, इसी कारण जड़ प्रकृति से अधिक उत्कृष्ट है। परमात्मा पूर्ण चैतन्य' है, वे जीव से भी ऊपर हैं। जीव पुरुष है तो प्रभु पुरुषोत्तम हैं। एवं प्रकृति 'उत्' है, जीव 'उत्तर' है और प्रभु 'उत्तम' हैं।
Essence
भावार्थ- हम प्रकृति के सौन्दर्य को समझते हुए, उसका यथायोग- उचित उपयोग करते हुए, प्रकृति से ऊपर उठें। उससे ऊपर उठकर आत्मस्वरूप का चिन्तन करें। आत्म-चिन्तन करते हुए हम उस सर्वोत्तम ज्योति देवों के भी देव परमात्मा का दर्शन करें।
Subject
उत् + उत्तर + उत्तम