Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 20

28 Mantra
38/20
Devata- यज्ञो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
चतुः॑स्रक्ति॒र्नाभि॑र्ऋ॒तस्य॑ स॒प्रथाः॒ स नो॑ वि॒श्वायुः॑ स॒प्रथाः॒ स नः॑ स॒र्वायुः॑ स॒प्रथाः॑।अप॒ द्वे॒षो॒ऽअप॒ ह्वरो॒ऽन्यव्र॑तस्य सश्चिम॥२०॥

चतुः॑स्रक्ति॒रिति॒ चतुः॑ऽस्रक्तिः। नाभिः॑। ऋ॒तस्य॑। स॒प्रथा॒ इति॑ स॒ऽप्रथाः॑। सः। नः॒। वि॒श्वायु॒रिति॑ वि॒श्वऽआ॑युः। स॒प्रथा॒ इति॑ स॒ऽप्रथाः॑। सः। नः॒। स॒र्वायु॒रिति॑ स॒र्वऽआ॑युः। स॒प्रथा॒ इति॑ स॒ऽप्रथाः॑ ॥ अप॑। द्वेषः॑। अप॑। ह्वरः॑। अ॒न्यव्र॑त॒स्येत्य॒न्यऽव्र॑तस्य। स॒श्चि॒म॒ ॥२० ॥

Mantra without Swara
चतुःस्रक्तिर्नाभिरृतस्य सप्रथाः स नो विश्वायुः सप्रथाः स नः सर्वायुः सप्रथाः । अप द्वेषोऽअप ह्वरोन्यव्रतस्य सश्चिम ॥

चतुःस्रक्तिरिति चतुःऽस्रक्तिः। नाभिः। ऋतस्य। सप्रथा इति सऽप्रथाः। सः। नः। विश्वायुरिति विश्वऽआयुः। सप्रथा इति सऽप्रथाः। सः। नः। सर्वायुरिति सर्वऽआयुः। सप्रथा इति सऽप्रथाः॥ अप। द्वेषः। अप। ह्वरः। अन्यव्रतस्येत्यन्यऽव्रतस्य। सश्चिम॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ऋतस्य) = [ऋत - यज्ञ - नि० ८1६] यज्ञ का (नाभिः) = केन्द्र, अर्थात् यज्ञरूप केन्द्र (चतुःस्रक्तिः) = ' धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाला है। 'स्रक्ति' शब्द का अर्थ दिशाएँ भी होता है। यज्ञ यदि केन्द्र है तो उसकी विविध दिशाएँ धर्म आदि हैं, अर्थात् यज्ञ से ये सब सिद्ध होते हैं । २. (स प्रथा:) = यह यज्ञ विस्तारवाला है, हमारी सब शक्तियों का विकास यज्ञ से ही होता है। ('अनेन प्रसविष्यध्वम्') = इन शब्दों में यज्ञ ही फूलने - फलने का मार्ग है। ३. (सः) = वह यज्ञ (नः) = हमारे लिए (विश्वायुः पूरे) = जीवन को देनेवाला है। [विश्व + आयु] अर्थात् यज्ञ हमें शतायु बनाता है और सौ के सौ वर्षों में (सप्रथा:) = हमारी शक्तियों को विस्तृत रखता है। ३. (सः) = वह यज्ञ (नः) = हमें (सर्वायुः) = पूर्ण जीवन देता है, अर्थात् शरीर के स्वास्थ्य के साथ मन की निर्मलता तथा मस्तिष्क की दीप्ति प्राप्त कराके हमारे जीवन को पूर्ण बनाता है। (सप्रथा:) = हमारी शक्तियों को अन्त तक विस्तृत किये रखता है। ४. प्रभो! इस यज्ञ के द्वारा हम (अन्यव्रतस्य) = शास्त्रविरुद्ध कर्मोंवाले ['अकर्मा दस्युः अभि ने अमन्तुः अन्यव्रतो अमानुष:'] दस्युओं से अपनाये जानेवाले (द्वेषः) = द्वेष को (अप सश्चिम) = अपने से दूर करें। ह्वरः कुटिलता को (अप सश्चिम) = अपने से दूर करें, अर्थात् इस यज्ञशीलता से सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि हमारे जीवन में वह द्वेष और वह कुटिलता न आएगी जो शास्त्रविरुद्ध कर्म करनेवाले लोगों में आ जाया करती है।
Essence
भावार्थ-यज्ञ के निम्न लाभ हैं - १. इससे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है। २. यह हमारी शक्तियों का विस्तार करते हुए शतायु बनाता है। ३. इससे हम शरीर, मन व मस्तिष्क तीनों के स्वास्थ्य को प्राप्त करके पूर्ण जीवनवाले होते हैं ४. हमसे द्वेष व कुटिलता दूर रहती है।
Subject
यज्ञमय जीवन