Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 16

28 Mantra
38/16
Devata- रुद्रादयो देवताः Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- भुरिगतिधृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्वाहा॑ रु॒द्राय॑ रु॒द्रहू॑तये॒ स्वाहा॒ सं ज्योति॑षा॒ ज्योतिः॑।अहः॑ के॒तुना॑ जुषता सु॒ज्योति॒र्ज्योति॑षा॒ स्वाहा॑।रात्रिः॑ के॒तुना जुषता सु॒ज्योति॒र्ज्योति॑षा॒ स्वाहा॑।मधु॑ हु॒तमिन्द्र॑तमेऽअ॒ग्नाव॒श्याम॑ ते देव घर्म॒ नम॑स्तेऽअस्तु॒ मा मा॑ हिꣳसीः॥१६॥

स्वाहा॑। रु॒द्राय॑। रु॒दाय॑। रु॒द्रहू॑तये॒ इति॑ रुद्र॒ऽहू॑तये। स्वाहा॑। सम्। ज्योति॑षा। ज्योतिः॑। अह॒रित्यहः॑। के॒तुना॑। जु॒ष॒ता॒म्। सु॒ज्योति॒रिति॑ सु॒ऽज्योतिः॑। ज्योति॑षा। स्वाहा॑। रात्रिः॑। के॒तुना॑। जु॒ष॒ता॒म्। सु॒ज्योति॒रिति॑ सु॒ऽज्योतिः॑। ज्योति॑षा। स्वाहा॑। रात्रिः॑। के॒तुना॑। जु॒ष॒ता॒म्। सु॒ज्योति॒रिति॑। सु॒ऽज्योतिः॑। ज्योति॑षा। स्वाहा॑ ॥ मधु॑। हु॒तम्। इन्द्र॑तम॒ इतीन्द्र॑ऽतमे। अ॒ग्नौ। अ॒श्याम॑। ते॒। दे॒व॒। घ॒र्म॒। नमः॑। ते॒। अ॒स्तु॒। मा। मा॒। हि॒ꣳसीः॒ ॥१६ ॥

Mantra without Swara
स्वाहा रुद्राय रुद्रहूतये । स्वाहा सञ्ज्योतिषा ज्योतिः अहः केतुना जुषताँ सुज्योतिर्ज्यातिषा स्वाहा । रात्रिः केतुना जुषताँ सुज्योतिर्ज्यातिषा स्वाहा । मधु हुतमिन्द्रतमेऽअग्नावश्याम ते देव घर्म नमस्तेऽअस्तु मा मा हिँसीः॥

स्वाहा। रुद्राय। रुदाय। रुद्रहूतये इति रुद्रऽहूतये। स्वाहा। सम्। ज्योतिषा। ज्योतिः। अहरित्यहः। केतुना। जुषताम्। सुज्योतिरिति सुऽज्योतिः। ज्योतिषा। स्वाहा। रात्रिः। केतुना। जुषताम्। सुज्योतिरिति सुऽज्योतिः। ज्योतिषा। स्वाहा। रात्रिः। केतुना। जुषताम्। सुज्योतिरिति। सुऽज्योतिः। ज्योतिषा। स्वाहा॥ मधु। हुतम्। इन्द्रतम इतीन्द्रऽतमे। अग्नौ। अश्याम। ते। देव। घर्म। नमः। ते। अस्तु। मा। मा। हिꣳसीः॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (रुद्राय) = [ रुद्र इति स्तोतृनाम- नि० ३।१६] स्तोता के लिए हम (स्वाहा) = अपना अर्पण करते हैं, (रुद्रहूतये) = [ रुद्रस्य हूतिर्यस्य] प्रभु को पुकारनेवाले के लिए (स्वाहा) = हम अपने को सौंपते हैं। प्रभु के उपासकों के संग बैठने से हमारा जीवन भी भौतिक वासनाओं से ऊपर उठकर प्रभु प्रवण बनता है। (ज्योतिषा सम्) [गत्य] (ज्योतिः) = उन ज्योतिर्मय जीवनवालों के साथ मिलकर हमारा जीवन भी ज्योतिर्मय बनता है। ('अग्निनाग्निः समिध्यते') = जैसे अग्नि से दूसरी अग्नि समिद्ध की जाती है उसी प्रकार उन ज्योतिर्मय जीवनवालों के सम्पर्क में हमारा जीवन भी ज्योतिर्मय बनता है। इस प्रकार प्रभु कृपा करें कि (अहः केतुना जुषताम्) = हमारा सारा दिन प्रकाश से सेवित हो। (सुज्योतिः) = हम उत्तम ज्योतिवाले हों। (ज्योतिषा) = इस ज्योति के हेतु ही (स्वाहा) = हम स्वार्थ त्याग करें - सब आराम व मौज को समाप्त कर दें। इसी प्रकार (रात्रिः) = रात भी (केतुना जुषताम्) = प्रकाश से सेवित हो। (सुज्योतिः) = हम उत्तम ज्योतिवाले हों, (ज्योतिषा) = इस ज्योति के दृष्टिकोण से (स्वाहा) = हम स्वार्थ त्याग करते हैं। २. ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम इस शरीर में उत्पन्न सोमशक्ति की रक्षा करनेवाले बनें। इसी सोम को 'मधु' कहते हैं। यह सब ओषधियों का सारभूत होता है। यह (मधु) = सोम (हुतम्) = आहुत होता है- समर्पित होता है। किसमें? [क] (इन्द्रतमे) = अधिक-से-अधिक जितेन्द्रिय पुरुष में और [ख] (अग्नौ) = आगे बढ़ने की वृत्तिवाले पुरुष में। जो व्यक्ति इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनता है, वही सोम की रक्षा कर पाता है। इन्द्रिय-विषयों में फँसते ही सोम की रक्षा सम्भव नहीं रहती। साथ ही जो जीवन-यात्रा में निरन्तर आगे बढ़ने की भावना रखता है, वही व्यक्ति इन्द्रिय-विषयों में फँसने से बच सकता है, अतः हम 'इन्द्रतम व अग्नि' बनकर हे देव! सब दिव्यता के पुञ्ज प्रभो! (ते) = आपके (घर्म) = तेज को (अश्याम) = प्राप्त करें। नतमस्तक हों। आपकी विनय ही हमें इस ३. हे प्रभो! (ते नमः अस्तु) = आपके प्रति हम योग्य बनाएगी कि हम इन्द्रियों के दास बनने से बचे रहेंगे, और हममें निरन्तर आगे बढ़ने की भावना बनी रहेगी। इस प्रकार हे प्रभो ! (मा मा हिंसी:) = आप मेरी हिंसा मत होने दीजिए। प्रभु - विनय ही हमें जितेन्द्रिय बनने की क्षमता प्रदान करती है और विनाश से बचाती है।
Essence
भावार्थ-प्रभु-स्तोताओं के सङ्ग में रहकर मैं अपने ज्ञान को बढ़ाऊँ और अन्ततः का सङ्गी बनकर सब प्रकार के प्रभु विनाश से ऊपर उठ जाऊँ।
Subject
प्रभु - स्तोताओं का सङ्ग व प्रभु-प्राप्ति