Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 10

28 Mantra
38/10
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
विश्वा॒ऽआशा॑ दक्षिण॒सद् विश्वा॑न् दे॒वानया॑डि॒ह।स्वाहा॑कृतस्य घ॒र्मस्य॒ मधोः॑ पिबतमश्विना॥१०॥

विश्वाः॑। आशाः॑। द॒क्षि॒ण॒सदिति दक्षिण॒ऽसत्। विश्वा॑न्। दे॒वान्। अया॑ट्। इ॒ह ॥ स्वाहा॑कृत॒स्येति॒ स्वाहा॑ऽकृतस्य। घ॒र्मस्य॑। मधोः। पि॒ब॒त॒म्। अ॒श्वि॒ना॒ ॥१० ॥

Mantra without Swara
विश्वाऽआशा दक्षिणसद्विश्वान्देवानयाडिह । स्वाहाकृतस्य घर्मस्य मधोः पिबतमश्विना ॥

विश्वाः। आशाः। दक्षिणसदिति दक्षिणऽसत्। विश्वान्। देवान्। अयाट्। इह॥ स्वाहाकृतस्येति स्वाहाऽकृतस्य। घर्मस्य। मधोः। पिबतम्। अश्विना॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्रों में पति-पत्नी का उल्लेख हुआ है। उन्हें इन मन्त्रों में 'अश्विनौ' शब्द भूगर्भविद्याविदौ से स्मरण किया है। 'अश्विनौ' का अर्थ आचार्य ने 'सुशिक्षितौ स्त्रीपुरुषौ' और 'स्त्रीपुरुषौ' दिया है। ऐतरेय० १।१८। में 'अश्विनौ' अध्वर्यू' इन शब्दों में स्पष्ट किया है कि हिंसाशून्य [अध्वर] यज्ञादि उत्तम कर्मों में व्यापृत स्त्री-पुरुष 'अश्विनौ' हैं। २. ये पति-पत्नी कुटिलता से दूर तथा सरल मनोवृत्ति से कार्यों में व्यापृत होने से 'दक्षिण' हैं। (विश्वाः आशा:) = सब दिशाएँ (दक्षिणसद्) = [दक्षिणे सीदन्ति ] इन सरल स्त्री-पुरुषों में निषण्ण होती हैं, अर्थात् इनकी सब इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। ये गलत इच्छाएँ नहीं करते इनकी इच्छाएँ शुभ होती हैं, अतः इनकी वे इच्छाएँ अवश्य पूर्ण होती हैं । ३. (अयाट् इह) = इस मानव-जीवन में यही पुरुष (विश्वान् देवान्) = सब देवों को, अर्थात् सब दिव्य गुणों को अपने साथ [यज्ञ संगतिकरण] = सङ्गत करता है। ४. इन पति-पत्नी को प्रभु आदेश देते हैं कि ('स्वाहाकृतस्य') = पेट की जाठराग्नि में [वैश्वानर - अग्नि में] भोजन को यज्ञ का रूप देकर खाते हुए (धर्मस्य) = शक्तिप्रद अन्न के [ घर्म = अन्न - नि० १।९] (मधोः) = सारभूत सोम का (पिबतम्) = पान करो। अन्न को यज्ञरूप में खाया जाए तो यह 'स्वाहाकृत' हो जाता है। इसे स्वाद के लिए नहीं, अपितु इस देव मन्दिर की रक्षा के लिए ही खाया जाता है। 'शक्तिप्रद अन्न का ही सेवन करना चाहिए' यह भावना 'धर्म शब्द से व्यक्त हो रही है।
Essence
भावार्थ- हम भोजन को भी यज्ञ का रूप दे दें। परिणामतः हम 'दक्षिण' बनेंगे, हमारी सभी आशाएँ पूरी होंगी, दिव्य गुणों से हमारा मेल होगा।
Subject
यज्ञरूप भोजन